प्रेस कार्ड” जेब में रखना है आसान , मगर उसका भार संभालना “कठिन”, पत्रकारिता को पेशा नहीं, सेवा बनाइए

पत्रकारिता जब देशहित के बजाए दलीय और सरकारों के हितसाधन में लग जाएगी तो उसका उपहास ही होगा

आज की पत्रकारिता के इसी आचरण और व्यवहार से समाज उसके प्रति वितृष्णा भाव बनाता जा रहा है। पत्रकारिता के बारे में सदा से यह धारणा रही है कि वह स्थाई विपक्ष की भूमिका में रहेगी।पत्रकारिता जब देशहित के बजाए दलीय और सरकारों के हितसाधन में लग जाएगी तो उसका उपहास ऐसे ही होगा, जैसे अभी हो रहा है। यह बात भारत ही नहीं, वैश्विक परिदृश्य के संबंध में भी लागू मानी जा सकती है। फर्क यह है कि जिन कुछ विकसित देशों में मीडिया यह कर रहा है, वहां जनमानस में स्पष्ट है कि अमुक मीडिया घराना ऐसा करेगा और अमुक मीडिया घराना वैसा करेगा लेकिन हमारे देश की पत्रकारिता निष्पक्षता का ढिंढोरा पीटते हुए घोर पक्षपाती होने का दुस्साहस कर रही है और चिंता की बात यही है। जिन अखबारों के प्रति जनमानस ‘पांचवें वेद’ जैसा भाव रखता रहा हो, वह स्वयं के कृत्यों से वह भाव खत्म करते जा रहे हैं। अखबारों की बातों पर कौन विश्वास करेगा, खबरिया चैनलों की विश्वसनीयता कहां जाकर टिकेगी, इसकी सहज कल्पना रूह कंपा देने वाली है। हर अखबार, हर चैनल अपने मुखपृष्ठ या प्रोमो में सच कहने का दावा करता है लेकिन जनमानस उन्हें अब पाखंडी समझने लगा है। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लोग जिस तरह की टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, वह मीडिया के लिए बेहद शर्मनाक हैं लेकिन वह पत्रकार, वह चैनल जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए कि इस दुर्गति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार हैं।
आज जब हम पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर दृष्टिपात करते हैं, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि यह पेशा अब अपनी मूल आत्मा से दूर होता जा रहा है। पत्रकारिता, जो कभी समाज का दर्पण मानी जाती थी, आज धुंधलाए शीशे में बदलती जा रही है। जहां पत्रकार कलम की धार से सत्ता को आईना दिखाते थे, वहीं आज एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो माइक और कैमरे को हथियार बनाकर अपने निजी स्वार्थ सिद्ध कर रहा है। “प्रेस कार्ड जेब में रखना आसान है, लेकिन उसे गरिमा से संभालना कठिन” यह वाक्य आज के तथाकथित पत्रकारों पर पूर्णतः लागू होता है। हर गली, नुक्कड़ और चौराहे पर एक नया ‘पत्रकार’ जन्म ले रहा है, जिसे न तो पत्रकारिता के सिद्धांतों की जानकारी है, न भाषा की मर्यादा का बोध और न ही सामाजिक सरोकार की समझ। फेसबुक पेज बनाकर, यूट्यूब चैनल खोलकर, खुद को “राष्ट्रीय पत्रकार” घोषित कर देना आज जितना आसान हो गया है, उतना ही कठिन हो गया है असली पत्रकारों के लिए अपनी साख बचाना। पत्रकारिता एक साधना है, यह केवल खबर दिखाने या छापने का काम नहीं, बल्कि वह मिशन है, जो समाज की सच्चाइयों को निष्पक्ष रूप से सामने लाता है। यह वह माध्यम है जो गरीब की आवाज को मंच देता है, शासन की चूक पर सवाल खड़ा करता है और राष्ट्रहित में बिना भय के कलम चलाता है। बिना किसी लोभ अच्छा लालच के आम जन समुदाय के दुख में हिस्सा बनकर उनका सहयोग भी करता है और सुख में हिस्सा बनकर उनकी खुशियों में भी शामिल होता है। पत्रकार गरीब हो सकता है लेकिन शोषक नहीं, इसलिए पत्रकार बंधुओ का सम्मान करें वह आपके लिए लड़ाई लड़ते हैं वह भी निशुल्क। पत्रकार बंधुओ को आपस में बटना नहीं चाहिए, क्योंकि आजकल राजनीतिज्ञ, बड़े सामाजिक कार्यकर्ता, बड़े व्यापारी के अपने-अपने निजी पत्रकार होते हैं जो निरंतर पत्रकारिता की गरिमा को गिराते रहते हैं ऐसे पत्रकारों को वृद्धावली वचन करना है इनको आम जनमानस के सुख-दुख से कोई वास्ता नहीं है, किसी भी प्रकार से धन अर्जन करना इनका मुख्य उद्देश्य है ऐसे पत्रकारों से निष्पक्ष पत्रकार बंधु अगर दूर रहें तो गरिमा बची रहेगी क्योंकि ऐसे पत्रकारों की बाढ़ आ गई है। पत्रकारिता समदर्शी होती है समान दृष्टि से जीव जगत के समस्त क्रियाकलापों पर नजर रखती है और यथा स्थिति के बारे में आम लोगों को बताती है और जागरूक भी करती है इसलिए वरिष्ठ एवं विचारवान पत्रकार बंधुओ को पत्रकारिता की गरिमा स्वयं बचाने होगी अन्यथा पेशेवर पत्रकार पत्रकारिता की गरिमा को धूमिल करने एवं धन अर्जन करने में लगे हुए हैं।
पत्रकारों का एक तबका सरकार में बैठे लोगों की थोथी कमियां गिनाने की कोशिश करता रहता है और एक तबका सरकार और सत्तारूढ़ दलों के पक्ष में खड़ा दिखता है। ऐसे में सच कैसे बाहर आएगा, पाठक और दर्शक नीर-क्षीर विवेक वाला किसे मानें, यह तय कर पाना आकाश के तारे गिनने जैसा है। आज की पत्रकारिता के इसी आचरण और व्यवहार से समाज उसके प्रति वितृष्णा भाव बनाता जा रहा है।पत्रकारिता में राजनीति बड़ा विषय होता है पर सब कुछ नहीं होता। यह पत्रकारों को पता है। पत्रकारिता के सरोकार अन्य विषयों से भी हैं। यह समझते हुए पाठक और दर्शक वर्ग में अपनी पैठ बनाने के लिए, फीलगुड कराने के लिए उन विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया है जहां ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी है।
                                                                     लेखक : वरिष्ठ पत्रकार अभय गंगवार

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