भूखों का पेट भरने वाले ‘रोटी वाले बाबा’ की कहानी, मथुरा में पेड़ के नीचे लकड़ी का चूल्हा, साधु-संतों की पंगत
प्रयागराज में बाटी-चोखा की दुकान चलाते थे बाबा रामदास

मथुरा/उत्तर प्रदेश। मथुरा में गिरराज परिक्रमा मार्ग पर आने वाला कोई संत और परिक्रमार्थी भूखा नहीं सोता है। गैस सिलेंडरों की किल्लत की वजह से भले ही कई होटल और ढाबे बंद हो गए हैं, लेकिन रोटी वाले बाबा लकड़ी के चूल्हे पर रोटी बनाकर भूखों का पेट लगातार भर रहे हैं। कुसुम सरोवर के पास एक पेड़ के नीचे बाबा रामदास ने चूल्हा बना रखा है। एक छप्पर के नीचे बैठक बाबा रामदास बड़े से तवे पर रोटियां लगातार सेंकते नजर आते हैं। इसके माध्यम से वह गरीबों का पेट भर रहे हैं। पूरे इलाके में वह रोटी वाले बाबा के नाम से मशहूर हैं। बाबा रामदास पिछले 10 सालों से यह भोजनालय चला रहे हैं। वह प्रयागराज के रहने वाले हैं। वह गिरिराज संत सेवा आश्रम के महंत राधा मोहन दास रघुनाथ सिद्ध के सानिध्य में यह भोजनालय चलाकर गरीबों का पेट भर रहे हैं। उनके भोजनालय की खास बात है कि यहां लकड़ी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है।
परिवार और बच्चों को छोड़कर बन गए संन्यासी
बाबा रामदास के परिवार में पत्नी और बच्चे हैं। वह सभी को छोड़कर संन्यासी बन गए हैं। पिछले दस सालों से कुसुम सरोवर पर रहकर भोजनालय चला रहे हैं। उनका कहना है कि सभी व्यवस्थाएं गिरिराज महाराज की महिमा से होती है।
बाबा रामदास रोटी वाले बाबा कैसे बने, इसके पीछे रोचक किस्सा है। बाबा रामदास के मुताबिक, मथुरा आने से पहले वह प्रयागराज में हाईकोर्ट के सामने बाटी चोखा की दुकान चलाते थे। एक दिन एक भूखा साधु उनकी दुकान पर आया और बोला कि चार दिन कुछ नहीं खाया है। यह बात सुनकर बाबा रामदास का मन पिघल गया। उन्होंने सोचा ऐसे न जाने कितने साधु होंगे जो भूखे पेट सोने पर मजबर होते होंगे। इसके बाद वह मथुरा में गिरिराज तलहटी आ गए और समाज सेवा करने लगे।
गोवर्धन संत बनवारी दास भी चला रहे 17 सालों से भंडारा
बाबा रामदास के अलावा कुछ और संत भी मथुरा में हैं जो भूखे लोगों को रोटी खिलाकर समाजसेवा करते हैं। ऐसे ही संत बनवारी दास हैं जो गोवर्धन में रोटी वाले बाबा के नाम से जाने जाते हैं। वह आमी से रिटायर हैं और नीम के पेड़ के नीचे बैठकर रोटियां सेंकते हैं। उनकी रसोई में हर रोज 60 किलो आटे की रोटी बनती है। साथ ही 25 किलो चावल बनता है। इसके लिए सामग्री दानवीर भेजते रहते हैं। भोजन से पहले हरिनाम संकीर्तन होता है। यह अखंड भंडारा 17 सालों से चल रहा है।





