एजुकेशन सिस्टम को चला रहे हैं कोचिंग माफिया! क्या शिक्षा व्यवस्था भटक गई है?

लेखक- राजीव कुमार गौड़ (परिपूर्ण सामाचार पत्र के दिल्ली स्टेट हेड हैं)
देश में शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, समझ और व्यक्तित्व का विकास माना जाता रहा है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह उद्देश्य कहीं न कहीं धुंधला पड़ता नजर आ रहा है। आज की हकीकत यह है कि स्कूल और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के बीच गहरी खाई बन चुकी है। NEET, JEE, CLAT, NDA और SSC जैसी प्रमुख परीक्षाओं में जो पूछा जाता है, वह अक्सर स्कूलों की पढ़ाई से मेल नहीं खाता। यही कारण है कि छात्रों और अभिभावकों का झुकाव तेजी से कोचिंग संस्थानों की ओर बढ़ रहा है।
यह स्थिति केवल एक शैक्षणिक समस्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक संकट का रूप ले चुकी है। स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री और प्रतियोगी परीक्षाओं के सिलेबस के बीच असंगति ने छात्रों को दोहरी तैयारी के बोझ तले दबा दिया है। परिणामस्वरूप, कोचिंग संस्थान शिक्षा के समानांतर एक अनिवार्य व्यवस्था बन गए हैं, जहां बिना जाए सफलता की कल्पना करना मुश्किल माना जाने लगा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब केवल औसत छात्र ही नहीं, बल्कि टॉपर और मेधावी छात्र भी कोचिंग पर निर्भर हो चुके हैं। इसका सीधा अर्थ है कि स्कूल शिक्षा प्रणाली पर भरोसा कम हो रहा है। यदि स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा पर्याप्त और प्रासंगिक होती, तो छात्रों को अतिरिक्त कोचिंग की आवश्यकता क्यों पड़ती?
कोचिंग उद्योग आज एक बड़े व्यापार में बदल चुका है। मोटी फीस, लंबी कक्षाएं और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। छोटे-छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक, हर जगह कोचिंग सेंटरों की भरमार है। शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि एक उत्पाद बनती जा रही है, जिसे खरीदना हर किसी के लिए संभव नहीं।
समस्या का समाधान केवल कोचिंग को दोष देने में नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार लाने में है। स्कूलों के पाठ्यक्रम को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के अनुरूप बनाने की आवश्यकता है। शिक्षण पद्धति को अधिक व्यावहारिक, विश्लेषणात्मक और परीक्षा-केंद्रित बनाना होगा। साथ ही, शिक्षकों को भी आधुनिक परीक्षा पैटर्न के अनुसार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
सरकार और शिक्षा नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि जब तक स्कूल शिक्षा मजबूत नहीं होगी, तब तक कोचिंग का वर्चस्व बना रहेगा। नई शिक्षा नीति (NEP) ने इस दिशा में कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
अंततः, यह प्रश्न हम सभी के सामने है—क्या हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहते हैं, जहां सफलता केवल कोचिंग पर निर्भर हो? या फिर हम एक ऐसी प्रणाली विकसित करना चाहते हैं, जहां स्कूल ही सफलता की मजबूत नींव बनें? समय आ गया है कि इस पर गंभीरता से विचार किया जाए, क्योंकि शिक्षा का भविष्य ही देश का भविष्य तय करता है।




