कोलकाता में बसों के रंग पर सियासत,अब चमचमाता भगवा, पश्चिम बंगाल की सरकार के साथ बदला सरकारी बसों का रंग
पश्चिम बंगाल में अब भगवा रंग की बसें चलने जा रही हैं। कुछ रूट पर यह चलने भी लगी हैं। रूट नंबर 58 सोनारपुर इलाके को न्यू टाउन के इको स्पेस एरिया से जोड़ता है। इस रूट पर जब चमचमाती केसरिया रंग की बसें उतरीं तो हर किसी को हैरानी हुई, क्योंकि उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी।

कोलकाता/एजेंसी। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के साथ सरकारी बसों के रंग बदलने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में कोलकाता और आसपास के इलाकों में चलने वाली बसों के रंग में बदलाव देखने को मिला है, जिससे राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
पिछले सप्ताह एसी-58 रूट पर नई सरकारी एसी बसें शुरू की गईं, जो सोनारपुर को न्यू टाउन के इको स्पेस से जोड़ती हैं। यात्रियों को जहां नीले-सफेद रंग की बसों की उम्मीद थी, वहीं उन्हें चमकीले केसरिया रंग की बसें देखने को मिलीं। इसके एक दिन बाद दक्षिण 24 परगना के घटकपुर और हावड़ा के संतरागाछी के बीच चलने वाली एक निजी बस सेवा भी केसरिया-सफेद रंग में सड़कों पर उतरी।
राज्य में बसों के रंग का राजनीतिक इतिहास रहा है। वामपंथी शासन के दौरान लाल रंग की बसें चलती थीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद बसों का रंग नीला-सफेद हो गया था। अब केसरिया रंग को लेकर नई बहस छिड़ गई है, जिसे भाजपा की पहचान से जोड़ा जा रहा है।
राज्य के परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह ने इस बदलाव को समय के अनुरूप बताया है। उनका कहना है कि केसरिया रंग ‘डबल इंजन’ सरकार की तेजी और आधुनिक, पर्यावरण-अनुकूल परिवहन व्यवस्था की दिशा में बदलाव का प्रतीक है। उन्होंने इसे कोलकाता के परिवहन तंत्र की प्रगतिशील रीब्रांडिंग करार दिया। वहीं, परिवहन विभाग से जुड़े वर्कशॉप और दफ्तरों में भी रंग परिवर्तन की प्रक्रिया जारी है। वेस्ट बंगाल ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (WBTC) और साउथ बंगाल स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (SBSTC) में ई-टिकट के डिजिटल वॉटरमार्क का रंग भी नीले से बदलकर केसरिया किया जा रहा है। हालांकि विभाग के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि रंग परिवर्तन को लेकर कोई औपचारिक नीतिगत निर्णय नहीं लिया गया है।
दूसरी ओर, इस बदलाव को लेकर आलोचनाएं भी सामने आ रही हैं। परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि इस तरह के दिखावटी बदलावों से मूल समस्याएं हल नहीं होतीं। ट्रांसपोर्ट यूनियन के नेता तपन दास ने आरोप लगाया कि हर नई सरकार परिवहन व्यवस्था को अपने राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना लेती है, जबकि ड्राइवरों और मेंटेनेंस स्टाफ की कमी जैसी समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।
रोजाना यात्रा करने वाले यात्रियों का भी मानना है कि बसों के रंग से ज्यादा जरूरी उनकी समयबद्धता और उपलब्धता है। आईटी पेशेवर अनिर्बान दत्ता ने कहा कि अगर बस के लिए लंबा इंतजार करना पड़े, तो उसके रंग का कोई महत्व नहीं रह जाता। उन्होंने प्रशासन से बसों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देने की मांग की।
‘कोलकाता बस-ओ-पीडिया’ के संस्थापक अनिकेत बनर्जी ने कहा कि शहर की पहचान समय के साथ बदलती रही है। पहले लाल बसें कोलकाता की पहचान थीं, फिर नीला-सफेद रंग आया और अब केसरिया रंग को सीएनजी युग की शुरुआत का संकेत माना जा सकता है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय एक बदलाव के रूप में समझने की अपील की है।




