350 साल से जारी है अनोखी परंपरा, नागवंशी राजाओं के समय से होली के दिन निकाली जाती है ‘झांकी’

रांची,(झारखंड)।नागवंशी राजाओं की पुरानी राजधानी चुटिया स्थित राधाबल्लभ (श्रीराम मंदिर) का इतिहास भी बहुत पुराना है। होली में यहां करीब साढ़े तीन सौ सालों से अनोखी परंपरा चली आ रही है। नागवंशी राजाओं ने 1685 में चुटिया स्थित श्रीराम मंदिर से फगडोल जतरा (झांकी) निकालने की परंपरा शुरू की। होली के दिन फगडोल जतरा यानी भगवान के विग्रहों की झांकी निकाली जाती है। प्राचीन श्रीराम मंदिर से बैंड-बाजा के साथ विग्रहों को झांकी में शामिल श्रद्धालु जयकारे लगाते हुए अपर चुटिया में डोल जतरा मैदान तक ले जाते हैं। झांकी दोपहर बाद में निकाली जाती है। श्रद्धालु सबसे पहले चबूतरे में स्थापित भगवान श्रीराम के चरणों में गुलाल अर्पित करते हैं। इसके बाद सभी बड़े-बुजुर्गां को गुलाल लगाकर त्योहार की खुशियां मनाते है। चुटिया इलाके में होली खेलने की भी अलग परंपरा है। इलाके में होली पहले पहर में ही खेली जाती है। दूसरे पहल में सभी नए और अच्छे कपड़े पहन कर झांकी में शामिल होते हैं।

चुटिया के प्राचीन श्रीराम मंदिर में होलिका दहन का भी अलग महत्व है। यहां एक दिन पहले ही होलिका दहन का आयोजन होगा है। इस ऐतिहासिक होलिका दहन कार्यक्रम का आयोजन फगडोल जतरा मेला समिति की ओर से किया जाता है।इस संबंध में चुटिया निवासी पुष्कर महतो ने बताया कि नागवंशी राजाओं ने वर्ष 1685 में यह परपंरा शुरू की थी। जिसके बाद से चुटिया के निवासी इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि होली के दिन फगडोल यात्रा (झांकी) के दौरान क्षेत्र की सभी महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग पहले भगवान के चरणों में रंग-अबीर अर्पित करते है। फिर एक-दूसरे को अबीर लगाते है। इस दौरान शिष्टाचार का विशेष ख्याल रखा जाता है।

मंदिर के महंत बताते है कि 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के चुटिया के राधाबल्लभ मंदिर आने और ठहरने के प्रमाण भी मिलते हैं। वक्त के साथ मंदिर में कई परिवर्तन हुआ। नागवंशी राजा रघुनाथ शाहदेव का भी धार्मिक व्यक्तित्व था। कहा जाता है कि वर्तमान राम मंदिर उनका ही महल था। महल के चारों ओर गुफाएं थी, जहां दिन-रात पहरेदार रहा करते थे। राजा को जब कहीं आना-जाना होता, तो वे इन गुफाओं का इस्तेमाल करते थे। राजा की भी आस्था कृष्ण में थी। एक बार राजा को मंदिर बनाने का स्वप्न आया। बाद में स्वप्न में नजर आए आकृति के अनुसार उन्होंने 1685ई. में पत्थर का खूबसूरत मंदिर बनवाया। बाद में नागवंशी नागवंशी राजाओं का किला चुटिया से दूसरे स्थान पर शिफ्ट हो गया।

मंदिर में एक चुआं (जल स्त्रोत) था, जहां रानी स्नान करने आती थी। वहीं मंदिर परिसर में एक कुआं भी मौजूद था। इस कुआं के बारे में कई कथाएं प्रचलित है। बताया जाता है कि मंदिर में अवस्थित कुआं के अंदर गुफा भी मौजूद है। गुफा के अंदर-अंदर ही करीब एक किलोमीटर दूर गोसाई तालाब जाने का सुरंगनुमा रास्ता भी था। राज परिवार के सदस्यों ने संकट के समस्या इसी गुफा और सुरंग के रास्ते सुरक्षित बाहर निकलते थे। कहा जाता है कि मंदिर के पुजारी हरभजन बाबा के बाद कोई भी इस गुफा के अंदर प्रवेश नहीं कर पाया। बाद में एक बड़ा पत्थर लगाकर इस गुफा के रास्ते को बंद कर दिया गया।

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