तुर्की का हाथ, हिजबुल मुजाहिदीन के साथ: आतंकियों के साथ नजर आए खलीफा एर्दोगन के शागिर्द
तुर्की के धार्मिक मामलों के मंत्रालय के एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल को हिजबुल मुजाहिदीन के वैचारिक और मूल संगठन जमात-ए-इस्लामी के साथ देखा गया है। इस मुलाकात को एक धार्मिक दान-पुण्य के तौर पर प्रदर्शित किया गया है। हालांकि, इसे पाकिस्तान के आतंकी संगठनों के साथ तुर्की के जुड़ाव के तौर पर भी देखा जा रहा है।

इस्लामाबाद/एजेंसी। तुर्की के सरकारी अधिकारियों को हिजबुल मुजाहिदीन की राजनीतिक शाखा के साथ देखा गया है। इसे जमात-ए-इस्लामी के नाम से जाना जाता है। हिजबुल मुजाहिदीन इसी का आतंकी विंग है। जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान का सबसे बड़ा इस्लामी राजनीतिक दल है। ऐसे में तुर्की के सरकारी अधिकारियों को जमात-ए-इस्लामी के साथ देखा जाना भारत के लिए चिंता को बढ़ा सकता है। इसका एक प्रमुख कारण कश्मीर पर तुर्की का पाकिस्तान को खुला समर्थन करना भी है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार कश्मीर मुद्दा उठा चुके हैं।
रेजोनेंट न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की के धार्मिक मामलों के मंत्रालय का एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ईद के तीसरे दिन सैयद मौदूदी स्मारक पर पहुंचा था। यह प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान में रस्मी कुर्बानी (बलिदान) और जरूरतमंदों को मदद पहुंचाने की गतिविधियों की देखरेख के लिए आया था। इसका प्रबंधन सीधे तौर पर अल-खिदमत फाउंडेशन के जरिए किया जा रहा था। रिपोर्ट में कहा गया कि इस दौरे के दौरान, तुर्की प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने कहा कि सैयद अबुल आला मौदूदी के मजार पर जाकर श्रद्धांजलि देना उनकी “दिल की तमन्ना” थी। सैयद अबुल आला मौदूदी जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक विचारक थे।
पाकिस्तान और तुर्की ने इसे समान्य अंतरराष्ट्रीय मानवीय और धार्मिक आदान-प्रदान के तौर पर पेश किया। लेकिन, तु्र्की के सरकारी अधिकारियों का जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व और उसकी दूसरी शाखाओं के साथ सीधे तौर पर जुड़ना भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। तुर्की घोषित तौर पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है। ऐसे में तुर्की का हिजबुल मुजाहिदीन के मूल संगठन जमात-ए-इस्लामी से नजदीकी बढ़ाना आतंकवाद को बढ़ावा दे सकता है।



