गुजरात के लूना गांव ने पतंग उड़ाने से किया ‘तौबा’, ताकि आसमां में सुरक्षित उड़ सकें ‘सारस’

Luna village of Gujarat has given up flying kites so that the cranes can fly safely in the sky

वडोदरा/गुजरात। वडोदरा से 20 किमी दूर लूना गांव जहां कभी उत्साह के साथ पतंग उत्सव मनाया जाता था, अब सारस पक्षियों के संरक्षण के लिए एक मिसाल बन गया है। इस गांव के लोगों ने सारस की सुरक्षा के लिए पतंगबाजी छोड़ दी है। ये पक्षी हर सर्दी में गांव के तालाब के आसपास के पेड़ों पर अपना बसेरा बनाते हैं। गांव वालों की इस पहल ने पक्षियों और इंसानों के बीच एक अनोखा रिश्ता बनाया है।
बता दें कि लूना गांव में उत्तरायण का त्यौहार हमेशा से पतंगबाजी का पर्याय रहा है। मयूर चौहान और उसके दोस्त 10 दिन पहले से ही इसकी तैयारी शुरू कर देते थे। 14 जनवरी को आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता था, लेकिन चार साल पहले पेंटेड स्टॉर्क (सारस) के आने से सब बदल गया। इन पक्षियों को देखते हुए गांव वालों ने पतंगबाजी छोड़ने का फैसला किया। वे नहीं चाहते थे कि मांझे से इन नाजुक पक्षियों को चोट पहुंचे।
लूना के लिए ये पेंटेड स्टॉर्क सिर्फ मेहमान पक्षी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं। 2,000 की आबादी वाले इस गांव में हर सर्दी में 300 से ज्यादा पेंटेड स्टॉर्क आते हैं। गांव में रहने वाले मयूर बताते हैं कि मुझे पतंग उड़ाने का बहुत शौक है, लेकिन पिछले दो सालों से मैंने एक भी पतंग नहीं उड़ाई। मैं उत्तरायण के दौरान छत पर जरूर जाता हूं, लेकिन सिर्फ सारसों पर नज़र रखने के लिए और यह देखने के लिए कि पतंग उन्हें परेशान न करें।
कुछ गांव वाले जो पतंग उड़ाने से खुद को रोक नहीं पाते, वे दोपहर के समय पतंग उड़ाते हैं, जब ये पक्षी अपने घोंसलों में आराम कर रहे होते हैं। ये स्टॉर्क दशकों से गांव के तालाब के आसपास के पेड़ों पर रहते आ रहे हैं, लेकिन पहले गांव वालों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पद्रा तालुका में सोसाइटी फॉर जीवरक्षक फॉर एनिमल्स चलाने वाले प्रवीण आर्य और उनके बेटे रूपेश ने बताया कि लगभग 10 साल पहले हमने गांव में पेंटेड स्टॉर्क के बारे में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना शुरू किया और लोगों को समझाया कि हमें इन पक्षियों का संरक्षण कैसे करना चाहिए।
धीरे-धीरे गांव वालों का इन पक्षियों से एक गहरा रिश्ता बन गया और वे उनकी देखभाल करने लगे। आर्य ने बताया कि लगभग तीन साल पहले, कुछ लोग रात में चोरी-छिपे गांव में आते थे और स्टॉर्क का शिकार करते थे। जब गांव वालों को इस बात का पता चला, तो उन्होंने टीम बनाई और उन इलाकों में रात में गश्त करना शुरू कर दिया ,जहां स्टॉर्क घोंसला बनाते थे। आखिरकार, शिकार बंद हो गया।

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