1867 की उर्दू में लिखी रामायण मिली! यूपी के संग्रहालय में है संरक्षित, इतिहासकार ने बताई इसकी खूबियां

गाजीपुर/उत्तर प्रदेश। भगवान राम प्राण प्रतिष्ठा को लेकर अयोध्या में जश्न का माहौल है। 22 जनवरी को पीएम नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में प्राण प्रतिष्ठा विधि-विधान से पूरी की जाएगी। इस दौरान पूरा देश रामभक्ति में डूबा हुआ है। इस बीच राम, रामायाण और उर्दू का एक खास जुड़वा सामने आया है। बताया जा रहा है कि चश्मय रहमत ओरिएंटल कॉलेज के संग्रहालय में 1867 में उर्दू में अनुवादित वाल्मीकि रामायण की प्रति आज भी संरक्षित है। इसे तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर देवी प्रसाद के कहने पर हरीबख्त ज्ञानी परमेश्वर दयाल ने अनुवादित किया था। रामायण की इस प्रति में उर्दू के साथ-साथ संस्कृति और हिंदी का प्रयोग भी किया गया है।
परमेश्वर दयाल कचहरी में मुख्तार के पद पर कार्यरत थे। उन्हें फारसी, उर्दू के साथ संस्कृति और हिंदी का भी विद्वान कहा जाता था। वह रायगंज मोहल्ले में रहते थे। उन्होंने रामायण को उर्दू में अनुवाद करने के साथ-साथ कई प्रसंगों का चित्रों के माध्यम से भी विस्तृत वर्णन किया है। उर्दू में लिखी इस रामायण की जानकारी इतिहासकार ओबैदुर्रह्मान को तब हुई जब वह गाजीपुर पर केंद्रित एक इतिहास की किताब लिखने के दौरान विभिन्न जगह से लेखन सामग्री एकत्र कर रहे थे। इसी दौरान उनका चश्मय रहमत में भी जाना हुआ।
लखनऊ से हुआ था प्रकाशन
उन्होंने बताया कि चश्मय रहमत ओरिएंटल कॉलेज के संग्रहालय में फारसी अरबी, उर्दू, संस्कृत और हिंदी की अनेक पांडुलिपि सुरक्षित रखी गई है। वहीं उन्हें उर्दू में लिखी इस रामायण के बारे में भी जानकारी मिली। उर्दू में लिखे इस रामायण में कुल 352 पन्ने हैं। इतिहासकार रहमान ने बताया कि इस रामायण का प्रकाशन लखनऊ के प्रकाशक ने उस दौर में किया था।
मदरसों में भी पढ़ाने की बात
गाजीपुर के इतिहास लेखन पर काम करने वाले इतिहासकार ओबैदुर्रह्मान ने उर्दू में अनुवादित वाल्मीकि रामायण का जिक्र अपने हाल में लिखी किताब में भी किया है। इतिहासकार रहमान के अनुसार मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में श्रीमद्भागवत गीता और रामायण के कुछ अंश धार्मिक विषय के तौर पर मदरसों में पाठ्यक्रम में शामिल कर विद्यार्थियों को पढ़ाए जाते थे।




