मीडिया को दबाव में रखने के लिए सरकार का नया आदेश जारी

नेशनल डेस्क। प्रेस की आजादी जरूरी है। मीडिया चौथा स्तंभ है। मीडिया का काम बड़ा ही चुनौती पूर्ण है। जैसे सिपाही देश की रक्षा की खातिर लड़ते हैं, उसी तरह लोकतंत्र की रक्षा के लिए मीडियावाले लड़ते हैं। ऐसे ऐसे जुमले सुन कर कान पक गए हैं। पक इसलिए गए हैं क्योंकि जुमलों और हकीकत में कोई तालमेल नहीं है। काबिल पत्रकार सड़क पर और कम पढ़े लिखे उंचे पदों पर विराजमान हैं। ये खबर पत्रकारों के लिए है। बिना पुष्टि के तोड़–मरोड़ कर गलत तथ्यों पर नकारात्क खबर किया तो ज़िलाधिकारी मीडिया संस्थान को पत्र भेज कर स्पष्टीकरण मांग सकता है। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार 2024 चुनाव से पहले उन यूट्यूब चैनलों और न्यूज़ पोर्टलों पर लगाम कसना चाहती है जो बिना सही तथ्यों के खबरों को दूसरा एंगल दे कर अपने व्यूज के लिए रायता फैलाते हैं।
वहीं कुछ अन्य लोगों का कहना है कि ये नई व्यवस्था मीडिया को दबाव में रखने के लिए है ताकि स्वस्थ आलोचना करने वालों को भी प्रशासनिक कार्रवाई से डराया जा सके।मालिक ही संपादक हैं। संपादक सत्ता के गलियारों के हिस्से बन गए हैं।

मीडिया का स्वरूप आज पूरी तरह बदल गया है। बदलाव की इस यात्रा में नैतिक मूल्यों, सामाजिक चेतना, संबंधों की पवित्रता, राष्ट्र के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की समझ में जबरदस्त गिरावट देखने को मिल रही है। यकीनन सभी पत्रकार गिरावट की दौड़ के खिलाड़ी नहीं हैं। जिन्हें रोजी रोटी की चिंता नहीं वे आज भी पत्रकारिता कर रहे हैं। लेकिन ऐसे पत्रकारों की संख्या गिनी चुनी है। अधिकांश पत्रकार तो भौतिक लालसा और इस लालसा की पूर्ति के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं और कर भी रहे हैं। वक्ताओं में से अधिकांश के विचारों से ऐसा लगा कि वे शायद यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि यहां की पत्रकारिता में राजनीति का असर हमेशा ही रहा है। कभी ज्यादा तो कभी कम। जैसे-जैसे राजनीति बदली वैसे-वैसे ही मीडिया का स्वाभाव और स्वरूप भी बदलता गया।
कभी पत्रकारिता मंदिर बनाम मस्जिद, तो कभी आरक्षण बनाम गैर-आरक्षण के खेमों में बांटी। और आज पत्रकारिता राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रद्रोह में बंट गई है। सरकार के खिलाफ जो बोले या लिखे वह राष्ट्रद्रोही और सरकार के पक्ष में जो लिखे बोले वह राष्ट्रभक्त।भारत के संविधान में अनुच्छेद 19 (1) के तहत अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है। प्रेस की स्वतंत्रता उसी का हिस्सा है, इसलिए इसकी अलग से चर्चा नहीं है। वैसे भी मीडिया कैसे स्वतंत्र रह सकता है जबकि संपादक ही मिडिएटर की भूमिका में हो। जब संपादक ही राज्यसभा जाने के लिए नेताओं की चमचागिरी करने लगे तो फिर मीडिया के स्वतंत्रता की बात करना बेमानी है। आज मीडिया सरकार और कॉरपोरेट दोनों के दबाव में काम कर रहा है।
दो चार बड़े घरानों का नेशनल मीडिया पर कब्जा है। चैनलों का भी यही हाल है। विज्ञापन के बगैर मीडिया चल नहीं सकता और जो विज्ञापन देगा वह अपने मन मुताबिक काम लेगा। वही हो रहा है जिसका असर विषय-वस्तु पर भी पड़ रहा है।
आज मीडिया से खबर गायब है। उसकी जगह मनोरंजन,चापलूसी और बेकार के खबरों ने ले ली है। रोज शाम हर चैनल पर पंचायत बैठ जाती है। एजेंडा और एंगल पहले से तय होता है। विषय और वक्ताओं का चयन मालिक से पूछ कर किया जाता है। मालिक सत्तारुढ़ दल से सलाह मशवरा करता रहता है कि दिखाना क्या है? ऐसे में पत्रकारिता कहां है?
शायद यही वजह है कि मीडिया के कवरेज को लेकर आज सवाल आवाम के साथ-साथ नेताओं की ओर से भी उठाए जा रहे हैं। कुछ नेता अपने अंदाज में मीडिया को चलाना चाह रहे हैं। अगर मीडिया उनके पक्ष में सकारात्मक खबरें दिखाता है तो उसे वे अच्छा कहते हैं और ऐसा नहीं होने पर मीडिया को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। चैनलों और अखबारों की रिपोर्टिंग में यह फर्क साफ साफ देखा जा सकता है। आज मीडिया सरकार और कॉरपोरेट जगत के स्वार्थ के लिए काम करने लगा है? कुछ वक्ताओं ने कहा कि दरअसल, मीडिया पर आज जो सवाल उठ रहे हैं, उसके लिए कुछ स्थितियां जिम्मेदार हैं। आज मीडिया के लिए कोई नियामक तय नहीं है। मीडिया को रेगुलेट करने वाली संस्थाएं टूथलेस टाइगर (बिना दांत के बाघ) हैं। उनके पास कोई पावर नहीं है। मीडिया में आया विदेशी निवेश भी गिरती साख के लिए जिम्मेदार है। पत्रकारों की नौकरी सुरक्षित नहीं है। पत्रकारिता में धंधेबाज लोग घुस आए हैं। अज्ञानी लोगों की भरमार है।

 

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