दिल्ली के सरकारी अस्पताल खुद ‘बीमार’: बेड, डॉक्टर और स्टाफ की कमी से उपचार पर संकट

दिल्ली के ये 'बीमार' अस्पताल कैसे करेंगे किसी रोगी का इलाज

नई दिल्ली। बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निर्माण होता है।’ पर, राष्ट्रीय राजधानी के स्वास्थ्य रक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाली स्वास्थ्य सेवाएं जब ‘स्वयं’ बीमार हो तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दिल्ली में यह कैसे संभव हो सकता है। यह हम नहीं कह रहे, ये शिकायत दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (डीएमए) की है। उसके अनुसार राष्ट्रीय राजधानी की जनसंख्या और भारतीय जन स्वास्थ्य मानक के लिहाज से दिल्ली में न तो पर्याप्त अस्पताल हैं और न ही चिकित्सक। इतना ही नहीं दिल्ली के अस्पतालों में पैरा-मेडिकल स्टाफ के साथ-साथ अस्पतालों में मानक के हिसाब से बेड भी नहीं हैं। यह स्थिति दिल्ली की जनसंख्या के मानक अनुसार है जबकि दिल्ली में प्रतिदिन एक लाख से अधिक मरीज दूसरे राज्यों से आते हैं। इन स्थितियों में चिकित्सकों सहित अन्य स्टाफ पर पर काम का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
कई-कई घंटे लगातार काम करने के कारण उनमें थकान, मानसिक तनाव और अनिद्रा की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसी शिकायत को लेकर दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल के चिकित्सक डा. अमित कुमार ने पिछले दिनों त्यागपत्र दे दिया था। दिल्ली के सरकार अस्पतालों में कुल स्वीकृत पदों के सापेक्ष तैनाती का औसत 70 से 75 प्रतिशत ही है, कहीं-कहीं यह इससे से भी कम है। डीएमए भी इसकी पुष्टि करता है। यह कमी न केवल मरीजों को स्तरीय स्वास्थ्य सेवा देने में बाधा उत्पन्न कर रही है, बल्कि मौजूदा चिकित्सकों-पैरा मेडिकल स्टाफ पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा रही है। उन्हें थकान हो रही है। थकान से त्रुटियां हो रही हैं, इससे स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर गिर रहा है। अस्पतालों में दवा इत्यादि की कमी तो आम बात है। कैग (सीएजी) 2025 रिपोर्ट दिल्ली के अस्पतालों में 21 प्रतिशत कर्मियों की कमी बताती है।
राष्ट्रीय राजधानी की जनसंख्या वर्तमान में ढाई करोड़ आंकी जाती है। भारतीय जन स्वास्थ्य मानक (आइपीचएस) के अनुसार हर ढाई लाख आबादी पर एक अस्पताल होना चाहिए। इस हिसाब से दिल्ली में कम से कम 100 अस्पताल होने चाहिए, जबकि वर्तमान में राज्य और केंद्र सरकार के अस्पतालों को मिलाकर इनकी संख्या करीब 95 ही है। इसमें दिल्ली सरकार के 37 अस्पताल शामिल हैं। इसी तरह मानक के अनुसार हर 50 हजार आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और एक लाख बीस हजार की जनसंख्या पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) होना चाहिए। इस मानक से दिल्ली को करीब 1000 प्राथमिक और सामुदायिक केंद्र होने चाहिए जबकि हैं 300 से भी कम। दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में अस्पतालों की संख्या भले कागज़ पर पूरी दिखे, मगर व्यावहारिक रूप से यह आवश्यकता से बहुत कम है, क्योंकि दिल्ली एम्स, सफदरगंज, गंगाराम जैसे अस्पतालों के कारण यहां प्रतिदिन दिल्ली के बाहर से आने वाले मरीजों की संख्या एक लाख से अधिक है। इसी तरह दिल्ली के अन्य सरकारी अस्पतालों में दिल्ली-एनसीआर के मरीज पहुंचते हैं। इस कारण अधिकतर अस्पतालों, चिकित्सकों पर मरीजों का दबाव क्षमता से कई गुना ज्यादा है, क्योंकि अस्पतालों की व्यवस्था का मानक दिल्ली की जनसंख्या है। बिहार के स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों के कुल स्वीकृत 2,583 पदों में से लगभग 487 पद खाली हैं, जबकि नॉन-टीचिंग स्पेशलिस्ट चिकित्सकों के 726 पदों में से 281 (लगभग 39 प्रतिशत) रिक्त हैं। मेडिकल ऑफिसरों के 20 प्रतिशत पद खाली हैं और टीचिंग स्पेशलिस्टों के 38 प्रतिशत पदों पर कमी है।
वर्तमान में कुल चिकित्सकों की तैनाती मात्र 3,000 के करीब है, जबकि आवश्यकता पाँच हजार की है। पैरामेडिकल स्टाफ (लैब टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट, फिजियोथेरेपिस्ट आदि) के लिए कुल स्वीकृत पद करीब सात हजार हैं, जिनमें से 1,534 से अधिक पद रिक्त हैं। वार्ड ब्वाय व चतुर्थ श्रेणी कर्मी के भी 15,000 पद हैं जिसमें से आठ हजार खाली हैं। इसके साथ ही कुल उपलब्ध बेडों की संख्या 13,708 हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकार के अस्पतालों को मिलाकर कुल 32,792 बेड हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) का मानक प्रति हजार जनसंख्या पर दो बेड है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार प्रति 1,000 पर एक बेड का प्रावधान है (हालांकि यह कोई स्थापित मानक नहीं है)।
दिल्ली की वर्तमान जनसंख्या के अनुसार प्रति हजार 1.31 बेड उपलब्ध हैं, वहीं आईपीएचएस के अनुसार सरकारी हिस्सेदारी प्रति हजार एक बेड की है। प्रतिशत में देखें तो एनएचपी मानक के अनुसार 34.5 प्रतिशत और डब्ल्यूएचओ मानक के अनुसार करीब 56 प्रतिशत बेड कम हैं।

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