पुरानी दिल्ली में आज भी खड़ी है मुशर्रफ के पुरखों की हवेली

नई दिल्ली। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का कल दुबई में निधन हो गया। मुशर्रफ का भारत से गहरा नाता रहा है। पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में आज भी मुशर्रफ की एक पुरानी हवेली है। इस हवेली में कभी मुशर्रफ रहा करते थे। रविवार को जब दरियागंज में गोलछा सिनेमा के पीछे की संकरी गलियों में मुशर्रफ के निधन की खबर आई, तो पूरी हवेली को गहरा सदमा लगा। मुशर्रफ पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति रहे, जिन्हें कारगिल युद्ध के वास्तुकार के रूप में याद किया जाता है। मुशर्रफ का जन्म 11 अगस्त 1943 को दिल्ली की नेहरवाली हवेली में हुआ था। जब वो चार साल के थे, तभी उनका परिवार उन्हें लेकर पाकिस्तान चला गया। साल 2001 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वायपेयी के बुलावे पर मुशर्रफ आगरा में शिखर सम्मेलन में शिरकत करने आए, तब भी ये हवेली चर्चा में आई थी, क्योंकि मुशर्रफ ने यहां का दौरा किया था। लेकिन सालों बाद न तो यहां नहर बची है और न ही हवेली। कुछ ही लोग हैं, जो इसे नेहरवाली हवेली के नाम से जानते हैं। अगर आप दरियागंज जाकर किसी स्थानीय से मुशर्रफ की हवेली के बारे में पूछेंगे, तो वो एक संकरी गली की ओर इशारा कर देगा, जहां ‘प्रताप स्ट्रीट’ लिखा होगा। इस जगह पर अब आवारा बिल्लियां और कई चाय के स्टॉल मिलेंगे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नेहरवाली हवेली को मुशर्रफ के दादा ने रिटायरमेंट के बाद खरीदा था। 1947 में हुए भारत विभाजन के बाद मुशर्रफ के परिवार ने इसे एक कपड़ा व्यापारी को बेच दिया और खुद पाकिस्तान में शिफ्ट हो गए। इलाके में रहने वाले कुछ लोगों के घरों में पुरानी हवेली के ढांचे के अवशेष आज भी हैं, लेकिन ये लोग मुशर्रफ को एक दुश्मन के रूप में याद करते हैं, जिसने भारत के खिलाफ युद्ध किया था। यहां रहने वाले कुछ लोगों ने बताया कि उन्हें याद है 2002 का वो दिन जब मुशर्रफ ने यहां आए थे। मुशर्रफ ने गोलचा सिनेमा के पीछे पुराने ढांचे के में चाय की चुस्की भी ली थी। अपने दौरे के दौरान मुशर्रफ ने कहा था कि इस इलाके की अपनी समस्याएं हैं और वो इसकी परवाह करते हैं। नेहरवाली हवेली का ऐसा ही एक हिस्सा गली के अंतिम छोर पर है, जहां जैन परिवार रहता है। ये घर लखोरी ईंटों से बना हुआ है, जहां टूटा हुआ प्लास्टर है, जो ये बताता है कि यहां कभी एक भव्य हवेली हुआ करती थी। यहां आर्क बालकनियों पुराने जमाने की कारीगरी को दर्शाती हैं। इसके चारों और एक बड़ा गूलर का पेड़ आज भी खड़ा हवेली को निहारता दिखता है। समय के साथ-साथ हवेली में कई बदलाव हुए। इसके अलग-अलग हिस्सों को बेचा गया, खरीदा गया, फिर से बनाया और सजाया गया। इलाके में कुछ इमारतें छह मंजिल से भी ऊंची हैं, जिनके सामने आसपास के मकान काफी छोटे लगते हैं। यहां रहने वाले जैन परिवार ने हवेली में मामूली बदलाव किया है। उन्होंने नेमप्लेट के ऊपर ‘ओम’ का चिन्ह बनाया है।




