पुलिस पूछताछ के लिए बुलाकर कुछ घंटे इंतजार कराना गिरफ्तारी नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते स्पष्ट किया है अगर आईओ के बिजी होने पर पुलिस स्टेशन पर इंतजार करना अरेस्ट नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने मनोहर पठारे के गैर-कानूनी हिरासत के दावे को खारिज कर दिया।

मुंबई/एजेंसी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए पुलिस थाने बुलाए जाने के बाद कुछ घंटों तक वहां इंतजार कराने मात्र से उसे गिरफ्तार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि केवल पुलिस की निगरानी में थाने में मौजूद होना गिरफ्तारी का आधार नहीं है। यदि पुलिस के पास तत्काल गिरफ्तारी नहीं करने का उचित कारण है और पूछताछ पूरी होने के बाद व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो 24 घंटे की अवधि वास्तविक गिरफ्तारी के समय से शुरू होगी।
न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल और न्यायमूर्ति आर.एस. भोंसले की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें मनोहर पठारे ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए अदालत से राहत की मांग की थी। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि गिरफ्तारी से पहले पुलिस द्वारा जांच और प्रारंभिक पूछताछ करना उसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
मामले के अनुसार मनोहर पठारे को सुबह करीब 11 बजे पूछताछ के लिए पुलिस थाने बुलाया गया था। वह थाने पहुंचा, लेकिन उसे तत्काल गिरफ्तार नहीं किया गया। उसकी वास्तविक गिरफ्तारी रात करीब 8.15 बजे की गई। इसके बाद उसे 24 घंटे की निर्धारित अवधि के भीतर अदालत के समक्ष पेश कर दिया गया।
अदालत ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि कोई व्यक्ति पुलिस थाने में मौजूद था, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। सरकारी वकील ने पीठ को बताया कि जब पठारे थाने पहुंचा, उस समय पुलिस एक अन्य मामले की जांच में व्यस्त थी। इसी वजह से उसे कुछ समय थाने में इंतजार करना पड़ा।
पीठ ने कहा कि मामले के तथ्यों से स्पष्ट है कि आरोपी को प्रारंभिक पूछताछ के लिए इंतजार कराया गया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने से पहले आवश्यक सावधानी बरती। अदालत ने यह भी माना कि वास्तविक गिरफ्तारी रात 8.15 बजे हुई और इसके 24 घंटे के भीतर उसे न्यायिक अधिकारी के समक्ष पेश कर दिया गया था। इसलिए गिरफ्तारी को अवैध ठहराने का कोई आधार नहीं है।
गिरफ्तारी से पहले पूछताछ पुलिस का अधिकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले की जांच के दौरान पुलिस को गिरफ्तारी से पहले व्यक्ति से पूछताछ और तथ्यों की पुष्टि करने का अधिकार है। केवल थाने में मौजूद रहने या पुलिस अधिकारियों की निगरानी में रहने को गिरफ्तारी की कानूनी स्थिति नहीं माना जा सकता। गिरफ्तारी तब मानी जाएगी जब पुलिस व्यक्ति को औपचारिक रूप से हिरासत में लेने का निर्णय लेकर उसकी स्वतंत्रता पर कानूनी रूप से रोक लगाती है।
गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत में पेश करना जरूरी
संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि से अधिक हिरासत में रखने के लिए अदालत की अनुमति आवश्यक होती है। हालांकि, व्यक्ति को अदालत के समक्ष पेश करने के लिए यात्रा में लगा आवश्यक समय 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जाता है।
अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि पूछताछ के लिए पुलिस थाने बुलाए जाने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच का समय स्वतः गिरफ्तारी की अवधि में शामिल नहीं किया जा सकता। इस मामले में पीठ ने वास्तविक गिरफ्तारी के समय और उसके बाद अदालत में पेश किए जाने की अवधि को आधार मानते हुए आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया।




