स्वेच्छा से देह व्यापर करने वाली महिलाए अपराधी नहीं, सेक्स वर्कर्स अधिकारों पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए एक विस्तृत “पीड़ित संरक्षण योजना” जारी की है। इस योजना में मानव गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को केंद्र में रखा गया है।

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने देह व्यापार, मानव तस्करी और वयस्क यौनकर्मियों के अधिकारों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि हर मामले को एक ही नजरिये से देखना अन्यायपूर्ण है। स्वेच्छा से देह व्यापार करने वाली वयस्क महिलाओं, तस्करी का शिकार महिलाओं और दबाव या हिंसा से इस दलदल में धकेली गई महिलाओं को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए विस्तृत “पीड़ित संरक्षण योजना” जारी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला को केवल इसलिए अपराधी नहीं माना जा सकता क्योंकि वह देह व्यापार से जुड़ी हुई है। अदालत ने कहा कि “यौनकर्मियों के अधिकार हो सकते हैं, भले ही देह व्यापार करने का कोई मौलिक अधिकार न हो।”
करीब तीन सौ पृष्ठों के इस फैसले में अदालत ने माना कि वर्तमान कानून तस्करी और स्वेच्छा से किए जा रहे देह व्यापार के बीच स्पष्ट भेद नहीं करता। इसी कारण सभी महिलाओं को एक जैसी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिससे भ्रम और सामाजिक अपमान की स्थिति पैदा होती है। अदालत ने मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी इच्छा से देह व्यापार कर रही है तो उसकी बात गंभीरता से सुनी जाए और उसे जबरन सुरक्षित गृह में न भेजा जाए।
पुलिस की भूमिका पर भी अदालत ने गंभीर टिप्पणियां कीं। हिरासत में यौन शोषण की शिकायतों को देखते हुए अदालत ने सरकार से कठोर प्रावधान बनाने का आग्रह किया। बचाव अभियानों के दौरान महिलाओं के साथ अपमानजनक भाषा, मारपीट या अनावश्यक बल प्रयोग पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए। साथ ही यह भी कहा गया कि तस्वीरें या वीडियो बनाते समय पीड़ित महिलाओं की पहचान उजागर न हो।
न्यायालय ने केंद्र सरकार से मानव तस्करी से निपटने के लिए एक व्यापक कानून बनाने की सिफारिश की है, जो केवल देह व्यापार तक सीमित न होकर हर प्रकार के शोषण को शामिल करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि देह व्यापार अपने आप में अवैध नहीं है, जबकि ग्राहकों को बुलाने जैसी गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं।
यह फैसला भारतीय समाज और कानून के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। अदालत ने पहली बार स्पष्ट किया है कि हर महिला को अपनी जिंदगी पर निर्णय लेने का अधिकार है और राज्य का काम उसकी गरिमा की रक्षा करना है, न कि नैतिकता के नाम पर उसे नियंत्रित करना।

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