गाजियाबाद में वेव सिटी के 13 हज़ार आवंटियों को झटका, लैंडयूज आवासीय नहीं होने से देना पड़ेगा कन्वर्जन चार्ज

गाजियाबाद। हाईटेक टाउनशिप में प्लॉट खरीदा है तो यह खबर आपके काम की है। दरअसल, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने मास्टरप्लान 2031 तैयार करके शासन के पास मंजूरी के लिए भेजा है। इसमें हाईटेक टाउनशिप के लैंडयूज को आवासीय नहीं किया गया। वहीं, कुछ भूमि को कृषि कर दिया है। यहां करीब 13 हजार लोगों ने प्लॉट खरीदे थे। अब लैंडयूज आवासीय नहीं होने से बिल्डर को लैंडयूज कन्वर्जन चार्ज जीडीए में जमा करना पड़ेगा, जिसका भार आवंटियों पर आएगा।
वेवसिटी की तरफ से शासन में इसको लेकर आपत्ति भी दर्ज कराई गई है। तर्क है कि जीडीए ने मास्टरप्लान 2031 को तैयार करते समय शासनादेश 2010 का पालन नहीं किया। नए मास्टरप्लान में भी हाईटेक टाउनशिप के लैंडयूज को आवासीय नहीं किया गया, जबकि शासनादेश 2010 के आधार पर यहां पर साल 2013 में डीपीआर और लेआउट पास किया जा चुका है। करीब 50 फीसदी एरिया विकसित भी हो चुका है। विकसित एरिया में आंशिक पूर्णता प्रमाणपत्र भी लिया चुका है। लोगों ने यहां रहना भी शुरू कर दिया। आवासीय लैंडयूज नहीं होने से अब जीडीए कन्वर्जन चार्ज निजी बिल्डर से लेगा।
5 से 10 लाख तक आ सकता है भार
बिल्डर प्रतिनिधि की मानें तो यहां रहने वाले आवंटियों पर 5 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक भार आ सकता है। भविष्य में भी जिन भूखंडों की बिक्री होगी, उसके लिए भी लैंडयूज कन्वर्जन चार्ज लिया जाएगा। शासनादेश 2010 में स्पष्ट था कि हाईटेक टाउनशिप का लैंडयूज आवासीय माना जाएगा।
मास्टरप्लान 2031 में आरिफपुर और इनायतपुर गांव सीमा को आबादी में दर्ज नहीं किया गया है। इस गांव के कुछ लैंडयूज को कृषि में रखा गया है, जबकि यह हाईटेक टाउनशिप के लेआउट का हिस्सा है। सवाल उठता है कि ऐसे में आवासीय लैंडयूज को कृषि कैसे किया जा सकता है? इस बात पर भी बिल्डर की आपत्ति है। ऐसे ही गांव दुजाना और दुरियाई में भी कुछ जमीन को कृषि कर दिया गया है।
29 को होगी हाई पावर कमिटी की मीटिंग
हाईटेक टाउनशिप के लैंडयूज परिवर्तन शुल्क के 572 करोड़ रुपये के बकाये को लेकर हाई पावर कमिटी की 29 जनवरी को मीटिंग होगी। इस कमिटी में ही तय होगा कि शुल्क लिया जाए या न लिया जाए। शासन ने 2010 में हाईटेक टाउनशिप को आवासीय मानने का आदेश दिया था, लेकिन 2014 में इस आदेश को खत्म कर दिया गया। इस पर कैग ने आपत्ति की थी कि बिल्डर को फायदा देने के लिए 2010 में शासनादेश किया गया है। उस पर 572 करोड़ रुपये भू-उपयोग परिवर्तन शुल्क बनता है।




