संतरे, पायजामा, कबूतर और कुल्फी की चोरी पर एफआईआर! ये उन दिनों की बात है जब ₹5 होता था जुर्माना

- दिल्ली पुलिस दशकों पुराने और दिलचस्प एफआईर की कॉपी डिजिटाइज कर रह रही है
- दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर कुछ दिलचस्प मुकदमों की कॉपियां अपलोड की जा रही हैं
- वर्ष 1866 से वर्ष 1900 के बीच दर्ज 29 एफआईआर को दिल्ली पुलिस ने अपलोड किया है
नई दिल्ली। वो भी क्या जमाने थे! बड़े-बुजुर्ग अक्सर अपने वक्त को याद कर लंबी सांस लेते हैं और कहते हैं- अब तो बहुत बदल गया है। और यह तो सही है कि वक्त के साथ-साथ सबकुछ बदलता है- समाज, इसका रहन-सहन, इसकी मान्यताएं, आपसी संबंध आदि आदि। बदलता समाज व्यक्ति की प्रवृत्ति को नई दिशा देता है तो इसके ठीक उलट बदले सोच वाले लोगों की वजह से समाज नया आकार लेता है। बदलाव की इस प्रक्रिया में इंसानी प्रवृत्ति बदलती है तो अपराध की प्रकृत्ति भी। सौ-सवा सौ साल पहले का समाज आज से बहुत अलग था, तब कैसे-कैसे अपराध हुआ करते थे- इसकी एक झलक दिल्ली पुलिस ने पेश की है। दिल्ली पुलिस ने अपनी वेबसाइट पर उस दौर की एफआईआर की कॉपियां अपलोड की हैं। उन कॉपियों से पता चलता है कि तब के समाज को कैसे-कैसे अपराध का शिकार होना पड़ रहा था।
पौधे चुराने पर लगा 5 रुपये का जुर्माना
मीडिया ने दिल्ली पुलिस की वेबसाइट से कुछ दिलचस्प एफआईआर पर एक रिपोर्ट पेश की है। इनमें एक एफआईआर 1 अक्टूबर, 1899 को उत्तरी दिल्ली के अलीपुर में फाइल की गई थी। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि तोरी नाम के एक व्यक्ति ने सड़क किनारे लगे कीकर के पौधे को जड़ से उखाड़कर अपने खेत में छिपा दिया। उसे गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 5 रुपये के जुर्माने पर छोड़ा गया।
धोखेबाज तो तब भी हुआ करते थे
इससे एक साल बाद, वर्ष 1900 में धोखेबाजी की एक घटना में मुकदमा हुआ था। शिवा नाम का एक व्यक्ति अपने रिश्तेदार फतेह से अपने लिए एक दुल्हन ढूंढने को कहा। फतेह और उसके एक साथी ने इसके लिए शिवा से 20 रुपये लिए। दोनों ने शिवा को 16 साल की एक लड़की से उसकी शादी करवाने की आश्वासन दिया। हालांकि, शादी के दिन शिवा को पता चला कि दुल्हन तो बहुत ज्यादा उम्र की है। जैसे ही यह भेद खुला, दुल्हन मौके से फरार हो गई। तब शिवा ने एफआईआर दर्ज करा दी।
कबूतरों से लेकर कुल्फी तक की चोरी
दिल्ली पुलिस ने डिजिटाइजेशन प्रोसेस के तहत वर्ष 1861 से 1900 के बीच इसी तरह की अनोखी 29 एफआईआर को वेबसाइट पर अपलोड किया है। इनमें ज्यादातर लूट के मामले हैं। मजेदार बात है कि एक कुल्फी की लूट का मुकदमा भी दर्ज है। इसके अलावा, 104 कबूतरों, 110 बकरों, एक जोड़ी पैजामा, 11 संतरे, एक बोतल शराब, एक गधा, बेडशीट, एक प्लेट आदि की भी एफआईआर दर्ज की गई है।
तब जल्दी सुलझ जाते थे मामले
इन पुरानी एफआईआर को संरक्षित करने में जुटे एसीपी राजेंदर सिंह कलकल ने मीडिया से कहा, ‘सन् 1800 में ज्यादातर गिरफ्तारियां और सजा भी घटना के कुछ दिनों के अंदर हो जाती थीं। उस वक्त चीजें इतनी पेचीदा नहीं थीं। तब संतरे, कबूतर और पैजामा भी बड़ी वस्तुएं हुआ करती थीं। आज हमारे पास हजारों केस हैं जिनमें कुछ तो इतने पेचीदे होते हैं कि उनकी जांच लगाने में बहुत वक्त लग जाता है। इन मामलों में फैसला आने में भी बहुत देर हो जाती है क्योंकि अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा हुआ है।’
1897 की वो हाई प्रोफाइल चोरी
उस वक्त का एक हाई प्रोफाइल केस जो दर्ज है, वह 1897 में नई दिल्ली के इंपीरियल होटल में चोरी का है। एफआईआर में कहा गया है कि होटल के एक कुक सब्जी मंडी थाने में अंग्रेजी में लिखा एक शिकायत पत्र लेकर आया। इसमें लिखा गया था कि कुछ चोर होटल के एक कमरे में घुसे और सिगार के कुछ पैकेट और शराब की एक बोतल चुरा ले गए। होटल ने चोर को पकड़ने के लिए अपनी तरफ से 10 रुपये के इनाम की घोषणा की थी। हालांकि, चोरों का कभी पता नहीं चल सका और यह केस अनसुलझा ही रह गया।
बाग से संतरे चुरा लिए, एक महीना जेल की चक्की पीसी
16 फरवरी, 1891 को सब्जी मंडी थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी। उसमें 11 संतरे चुराने की शिकायत की गई थी। इसमें कहा गया है, ‘आरोपी राम बख्श ने चार-पांच लोगों के साथ राम प्रसाद के बगीचे से 11 संतरे चुरा लिए।’ 233 फरवरी, 1891 को सभी आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें एक महीने की सश्रम कारावास की सजा हुई।
1200 में ही शुरू हुआ था पुलिस सिस्टम
यूं तो दिल्ली, पंजाब और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में पुलिस सिस्टम की शुरुआत तो सन् 1200 के आसपास ही हो गई थी। लेकिन उसे संगठित स्वरूप मिला 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के बाद। 1861 में इंडियन पुलिस ऐक्ट बना और दिल्ली में पांच थाने बनाए गए- महरौली, सब्जी मंडी, नांगलोई, कोतवाली और सदर बाजार। ध्यान रहे कि उस वक्त पुलिस रिपोर्ट उर्दू में लिखी जाती थी। दिल्ली पुलिस की पर्सेप्शन मैनेजमेंट एंड मीडिया सेल इनका हिंदी अनुवाद करवाकर वेबसाइट पर अपलोड करवा रही है। एसीपी कलकल ने बताया कि उन्होंने सैकड़ों एफआईआर पढ़े और पता चला कि करीब 200 से भी ज्यादा वर्षों तक एफआईआर का फॉर्मेट समान रहा।




