पाकिस्तान में आपातकाल पर सियासी घमासान, मौलाना डीजल ने सेना को ठहराया आतंकवाद के लिए जिम्मेदार
पाकिस्तानी सेना के शह पर शहबाज शरीफ की सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल लगा दिया है। इसे लेकर पाकिस्तान में कई राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। इसमें मौलाना फजलुर रहमान भी शामिल हैं, जिन्होंने इसके लिए पाकिस्तानी सेना को जिम्मेदार ठहराया है।

इस्लामाबाद,एजेंसी। पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लागू करने के फैसले को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार के फैसले का विरोध करते हुए जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने देश में आतंकवाद की समस्या के लिए सेना की रणनीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए खैबर पख्तूनख्वा से तत्काल आपातकाल हटाने की मांग की है।
मौलाना फजलुर रहमान, जिन्हें मौलाना डीजल के नाम से भी जाना जाता है, ने आरोप लगाया कि लंबे समय से चलाए जा रहे आतंकवाद विरोधी अभियानों के बावजूद पाकिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि पूर्व सैन्य शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल से लेकर अब तक अपनाई गई रणनीतियां स्थायी शांति और सुरक्षा स्थापित करने में सफल नहीं रही हैं।
रहमान ने देश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का उल्लेख करते हुए सरकार और सेना की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि वर्षों के अभियानों के बाद भी आतंकवाद की समस्या गंभीर बनी हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित रणनीतियों और उन्हें लागू करने वालों पर तय होनी चाहिए। उनके मुताबिक, मौजूदा हालात सुरक्षा नीति की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
मौलाना फजलुर रहमान ने संघीय सरकार के फैसले पर भी सवाल उठाते हुए पूछा कि जब बलूचिस्तान भी गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो आपातकाल के लिए केवल खैबर पख्तूनख्वा को ही क्यों चुना गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों प्रांतों के प्रति केंद्र सरकार का रवैया राजनीतिक कारणों से प्रभावित हो सकता है।
रहमान ने दावा किया कि बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार संघीय सरकार के निर्देशों के प्रति अधिक सहमत रहती है, जबकि खैबर पख्तूनख्वा की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। उन्होंने इस अंतर को सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों के बजाय राजनीतिक मतभेदों से जोड़कर देखा।
इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार पर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के साथ बातचीत के दौरान किए गए वादों से पीछे हटने का आरोप भी लगाया। उनके बयान से पाकिस्तान में आतंकवाद, प्रांतीय प्रशासन और संघीय सरकार की नीतियों को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के और तेज होने के संकेत मिले हैं। हालांकि, सेना और संघीय सरकार पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया के बिना इन्हें मौलाना रहमान के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।




