दीपावली पर मां लक्ष्मी को क्यों चढ़ाए जाते हैं खील-बताशे? सदियों पुरानी परंपरा के पीछे छिपा है सुख-समृद्धि और नई फसल का संदेश
दीवाली पर मां लक्ष्मी की पूजा में खील-बताशे चढ़ाने की परंपरा सदियों पुरानी है। यह नई फसल, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक है, जिससे देवी प्रसन्न होती हैं और धन-वैभव का आशीर्वाद देती हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीपावली का पर्व रोशनी, खुशियों और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन घरों में दीपों की जगमगाहट के बीच मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि दीपावली की रात मां लक्ष्मी का पूजन करने से घर में धन, वैभव और सुख-शांति का आगमन होता है। पूजा के दौरान दीपक, फूल, फल और मिठाइयों के साथ खील-बताशे का भोग लगाने की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा का धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अपना अलग महत्व है।
दीपावली के बाजारों में खील-बताशों की दुकानें सजते ही त्योहार की रौनक बढ़ जाती है। लोग इन्हें खरीदकर घर लाते हैं और लक्ष्मी पूजन की थाली में विशेष रूप से शामिल करते हैं। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर मां लक्ष्मी को खील-बताशे ही क्यों अर्पित किए जाते हैं और इस परंपरा के पीछे कौन-सी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।
खील और बताशे दोनों ही पारंपरिक खाद्य पदार्थ हैं। खील मुख्य रूप से धान से तैयार की जाती है। इसे बनाने के लिए कच्चे धान या चावल को गर्म रेत अथवा नमक में भुना जाता है, जिससे दाने फूलकर हल्के और कुरकुरे हो जाते हैं। वहीं बताशे चीनी से तैयार की जाने वाली पारंपरिक मिठाई हैं। इन्हें बनाने के लिए चीनी को पानी में उबालकर गाढ़ा किया जाता है और फिर विशेष आकार में ढालकर जमाया जाता है। सफेद रंग के ये बताशे पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में लंबे समय से इस्तेमाल किए जाते रहे हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, खील को पवित्रता और नई फसल का प्रतीक माना जाता है। दीपावली का समय खरीफ की फसल के तैयार होने का भी होता है। ऐसे में नई फसल से प्राप्त धान से बनी खील को सबसे पहले मां लक्ष्मी को अर्पित करना प्रकृति और अन्न के प्रति आभार व्यक्त करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है। भारतीय संस्कृति में अन्न को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसे जीवन का आधार और ईश्वर का प्रसाद माना जाता है। इसी भावना के साथ नई फसल से तैयार खील का भोग मां लक्ष्मी को लगाया जाता है।
वहीं बताशों को मिठास, शुभता और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इनका सफेद रंग शांति और सकारात्मकता का संदेश देता है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में बताशों को शुक्र ग्रह से भी जोड़कर देखा जाता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शुक्र को सुख-सुविधा, वैभव और ऐश्वर्य का कारक माना जाता है। इसी वजह से मां लक्ष्मी की पूजा में खील-बताशे अर्पित करने को धन-धान्य और समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
मां लक्ष्मी को खील-बताशे चढ़ाने के पीछे एक महत्वपूर्ण भाव यह भी है कि मनुष्य अपनी मेहनत से प्राप्त अन्न और मिठास को सबसे पहले ईश्वर के चरणों में समर्पित करे। खील जहां अन्न और नई उपज का प्रतीक है, वहीं बताशे जीवन में मिठास और खुशहाली की कामना को दर्शाते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ इनका भोग लगाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को सुख, शांति, धन तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
उत्तर भारत में दीपावली के अवसर पर खील-बताशे चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। लक्ष्मी पूजन के बाद इन्हें प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और परिचितों में बांटा भी जाता है। इस तरह यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि परिवार और समाज के बीच प्रेम, अपनत्व तथा खुशियां बांटने का माध्यम भी बनती है।
दरअसल, दीपावली पर मां लक्ष्मी को खील-बताशे अर्पित करना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में अन्न के सम्मान, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन में मिठास बनाए रखने का संदेश भी देता है। यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी सदियों पुरानी यह परंपरा अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ कायम है।
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