गर्भ में ही हो सकती है बच्चों के हृदय रोगों की पहचान, फिर भी हर साल 2.1 लाख बच्चे उपचार से वंचित
गर्भ में ही बच्चों के दिल की बीमारियों की पहचान फीटल इकोकार्डियोग्राफी से संभव है।

हेल्थ डेस्क,नई दिल्ली। गर्भावस्था के दौरान आधुनिक जांच तकनीकों की मदद से बच्चे के हृदय में मौजूद गड़बड़ियों का पता लगाया जा सकता है। इसके बावजूद देश में हृदय रोग से पीड़ित करीब 2.1 लाख बच्चे हर साल समय पर उपचार से वंचित रह जाते हैं। इसकी प्रमुख वजह जांच सुविधाओं का सीमित होना और अभिभावकों में जागरूकता की कमी है। बाल हृदय रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों की अचानक होने वाली मौत के पीछे कुछ आनुवंशिक हृदय रोग भी जिम्मेदार हो सकते हैं। इन बीमारियों में सामान्य दिखने वाले बच्चे की धड़कन व्यायाम या मानसिक तनाव के दौरान अचानक असामान्य हो सकती है और स्थिति जानलेवा बन सकती है।
मैक्स अस्पताल, पटपड़गंज की बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मिली रे के अनुसार, फीटल इकोकार्डियोग्राफी के जरिए गर्भ में ही बच्चे के हृदय और उसकी बनावट में मौजूद संभावित विकारों की पहचान की जा सकती है। समय रहते इसकी जानकारी मिलने पर अभिभावकों को प्रसव और बच्चे के जन्म के बाद जरूरी उपचार की तैयारी करने का अवसर मिलता है। एम्स की पूर्व प्रोफेसर डॉ. अनीता सक्सेना के अनुसार, देश में हर साल दो लाख से अधिक बच्चे हृदय रोग के साथ जन्म लेते हैं। इनमें से लगभग हर पांचवें बच्चे को जन्म के पहले वर्ष में ही उपचार की आवश्यकता पड़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ आनुवंशिक हृदय रोगों में दिल की धड़कन को नियंत्रित करने वाली विद्युत प्रणाली प्रभावित हो जाती है। इसके कारण व्यायाम या तनाव की स्थिति में दिल की धड़कन असामान्य रूप से तेज और अनियमित हो सकती है। कुछ बच्चों में हृदय की मांसपेशियां सामान्य से अधिक मोटी या कमजोर होने लगती हैं, जिससे हृदय की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। ब्रुगाडा सिंड्रोम और वोल्फ-पार्किंसन-व्हाइट (डब्ल्यूपीडब्ल्यू) सिंड्रोम भी इसी तरह की गंभीर स्थितियां हैं। ब्रुगाडा सिंड्रोम में हृदय की विद्युत गतिविधि प्रभावित होती है, जबकि डब्ल्यूपीडब्ल्यू सिंड्रोम में हृदय में विद्युत संकेतों के प्रवाह के लिए एक अतिरिक्त रास्ता बन जाता है। इन स्थितियों में समय पर पहचान और चिकित्सकीय निगरानी बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को आगाह किया है कि बच्चों में व्यायाम के दौरान या उसके तुरंत बाद बेहोशी, दौरे जैसी स्थिति, सीने में दर्द, सांस फूलना या अचानक तेज धड़कन जैसे लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज न करें। परिवार में कम उम्र में किसी की अचानक मृत्यु, तैरते समय डूबने की घटना, आनुवंशिक हृदय रोग का इतिहास या जन्मजात बहरापन भी संभावित खतरे के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बच्चे की विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है।
डॉ. मिली रे के अनुसार, अचानक मृत्यु की तात्कालिक वजह हृदय और सांस की क्रिया रुकना हो सकती है, लेकिन इसके पीछे मौजूद वास्तविक कारण का पता लगाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए हृदय संबंधी जांच के साथ सिर या छाती में चोट, तंत्रिका तंत्र और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों की भी पड़ताल जरूरी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान समय पर जांच, बच्चों में शुरुआती लक्षणों की पहचान और जागरूकता बढ़ाकर कई गंभीर स्थितियों में समय रहते उपचार संभव बनाया जा सकता है।



