रहस्यमयी खीर भवानी कुंड के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु, रंग बदलने की परंपरा से जुड़ी आस्था

गांदरबल के तुलमुला में ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी पर खीर भवानी मेला आयोजित हुआ, जहाँ हजारों श्रद्धालु माता रागन्या देवी के पवित्र कुंड में दूध-खीर चढ़ाते हैं। इस कुंड का पानी रंग बदलकर कश्मीर में आने वाले संकटों का संकेत देता है, जो कश्मीरी पंडितों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

श्रीनगर/एजेंसी। कश्मीर की वादियों में स्थित प्रसिद्ध खीर भवानी मंदिर में ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी के अवसर पर आयोजित वार्षिक मेले में हजारों श्रद्धालु जुटे हैं। गांदरबल जिले के तुलमुला गांव में स्थित माता रागन्या देवी के इस पवित्र धाम में भक्त कुंड में दूध और खीर अर्पित कर अपनी आस्था प्रकट कर रहे हैं। कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है, जहां हर वर्ष देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। खीर भवानी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडितों की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। श्रीनगर से लगभग 14 मील दूर प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस मंदिर परिसर में श्रद्धा और रहस्य का अनोखा संगम देखने को मिलता है।
मंदिर परिसर में स्थित पवित्र कुंड अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस कुंड का जल समय-समय पर रंग बदलता है और विशेषकर इसका काला या गहरा रंग किसी बड़े संकट का संकेत माना जाता है। इतिहास में कई घटनाओं के साथ इस परिवर्तन को जोड़ा जाता रहा है, जिनमें 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन और 2014 की विनाशकारी बाढ़ प्रमुख हैं। हालांकि इस रहस्य को लेकर वैज्ञानिक स्पष्ट निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके हैं, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच इसकी गहरी आस्था बनी हुई है।
इस पवित्र स्थल का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसे माता रागिनी कुंड के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि ‘आईन-ए-अकबरी’ में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ जैसे महान संत भी यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता रागन्या देवी लंकापति रावण की कुलदेवी थीं। रावण के अधार्मिक आचरण से दुखी होकर माता ने लंका त्याग दी और भगवान हनुमान के माध्यम से कश्मीर के तुलमुला क्षेत्र में विराजमान हुईं। कहा जाता है कि रावण द्वारा खीर अर्पित किए जाने के बाद ही देवी का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा।
माना जाता है कि प्राचीन काल में बाढ़ के कारण यह स्थान जलमग्न हो गया था, जिसके बाद एक योगी को स्वप्न में देवी ने इस पवित्र स्थल का संकेत दिया। बाद में यहां मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। वर्तमान में कुंड के मध्य स्थित संगमरमर का भव्य मंदिर महाराजा प्रताप सिंह द्वारा बनवाया गया था, जो आज भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है।
कश्मीर से विस्थापन के बाद जम्मू में बसे कश्मीरी पंडितों ने वहां भी माता रागन्या का मंदिर स्थापित किया, लेकिन अब हालात सामान्य होने पर एक बार फिर कश्मीर स्थित इस प्राचीन धाम में श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या पहुंच रही है। मेले के दौरान मंदिर परिसर में सुरक्षा और व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं।

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