प्रह्लाद पटेल की पुस्तक ‘परिक्रमा’ का मोहन भागवत ने किया विमोचन

प्रह्लाद पटेल ने पुस्तक ‘परिक्रमा’ में किया 30 साल पुराने अनुभवों का जिक्र

नई दिल्ली। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने मप्र की नदियों के उद्गम को बचाने शुरू की अपनी ‘उद्गम मानस यात्रा’ को लेकर संकल्पों को दृढ़ता से दुहराया है। उन्होंने कहा कि अगर वो केंद्र से मप्र की राजनीति में न लौटते, तो शायद नदियों के उद्गम को बचाने का संकल्प न ले पाते। पटेल नर्मदा परिक्रमा के अनुभवों पर लिखी अपनी पुस्तक ‘परिक्रमा-कृपा सार’ के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि पटेल ने 2 वर्ष पहले ‘उद्गम मानस यात्रा’ शुरू की थी। इसके तहत वो अब तक 108 नदियों के उद्गम स्थलों तक पहुंचे हैं। इसका उद्देश्य मप्र की जीवनदायिनी नदियों के पुनर्जीवन और संरक्षण को लेकर जनजाग्रति लाना है। साथ ही पर्यावरण के प्रति लोगों को चेताना भी है।
इंदौर के ‘ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर’ में 14 सितंबर(हिंदी दिवस) पर मंत्री पटेल की नर्मदा परिक्रमा के अनुभवों और अनुभूतियों पर संकलित पुस्तक ‘परिक्रमा-कृपा सार’ का विमोचन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघसंचालक मोहन भागवत के मुख्य आतिथ्य और महामंडलेश्वर श्रीश्री 1008 श्री ईश्वरानंद जी महाराज की विशेष आतिथ्य में किया गया था। विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. भागवत ने कहा-‘नर्मदा परिक्रमा में जो कुछ प्रहलाद जी को बोध मिला होगा, उस बोध(पुस्तक) को सरसरी तौर पर जो मैंने पढ़ा है, उसमें तो यही है कि-मैं और मेरा छोड़ो; अंतःकरण पवित्र करो। स्वार्थ बिल्कुल मत रखो। कर्तव्य, कर्म करते चलो। सबको अपना मानकर चलते जाओ।’ डॉ. भागवत पुस्तक को सारगर्भित तरीके से समझाया कि दुनिया में झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि लोग “मैं और मेरा” की भावना में बंधे रहते हैं। धर्म का असली अर्थ है – बिना किसी को दु:ख दिए जीवन जीना। धर्म कभी किसी को दु:ख नहीं देता, दुनिया लॉजिक से नहीं धर्म से चलती है।
कार्यक्रम के दौरान पटेल ने पुस्तक के लेखन से जुड़े अनुभव साझा करते हुए कहा कि 30 वर्ष पूर्व उन्होंने अपने आराध्य श्रीश्री बाबाश्री जी की सेवा करते हुए नर्मदा परिक्रमा की थी। इस यात्रा का राजनीति से कोई संबंध नहीं था। उसी दौरान के अनुभव और अनुभूतियों को संकलन करके यह किताब सामने आई है। पटेल ने कहा कि नर्मदा परिक्रमा के दौरान जब वो श्रीश्री बाबाश्री जी के साथ चलते थे, तब उन्होंने कहा था कि संगम नदियों का हो; संगम पहाड़ों का हो या संगम स्त्री पुरुष का हो, वहाँ जीवन की संभावना होती है, उसे कुचलने की गलती मत करना। तब यह बात उन्हें समझ में नहीं आई। चेतने में उन्हें 30 वर्ष लग गए। पटेल ने खुलासा किया कि वे नर्मदा के अपने अनुभवों को बेचना नहीं चाहते थे, इसलिए कभी पुस्तक छपवाने की इच्छा नहीं हुई। लेकिन अब उनके मित्रों के आग्रह पर यह पुस्तक सामने आई है। इससे जो भी प्राप्त होगा, वो गौसेवा और नर्मदा सेवा में लगाया जाएगा।
प्रहलाद पटेल ने केंद्र से मध्य प्रदेश की राजनीति में वापसी का जिक्र करते हुए कहा-‘अगर मैं मध्यप्रदेश लौटकर नहीं आता, तो शायद वो काम(नदियों के उद्गम को बचाने का संकल्प) में नहीं कर पाता। मुझे लगता है कि पर्यावरण के लिए इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता।’ पुस्तक विमोचन से पूर्व डॉ. भागवत को प्रहलाद सिंह पटेल द्वारा अपनी ‘उद्गम मानस यात्रा’ के दौरान एकत्रित किए 108 नदियों का पवित्र जल सौंपा गया।

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