बाढ़ में बहा नेपाल का उत्तरी व्यापार गलियारा, चीन से जमीनी संपर्क टूटा; भारत पर बढ़ी निर्भरता

नेपाल में पिछले महीने की 26 तारीख को भयानक बाढ़ आई थी जिसमें रसुवागढ़ी-तिमुरे में मौजूद ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्प्लेक्स तबाह हो गया है। नेपाल इस पोर्ट के रास्ते चीन से व्यापारिक संबंध का विकास कर रहा था और वो भारत पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता था। लेकिन अब ये रास्ता कई सालों के लिए तबाह हो गया है।

काठमांडू,एजेंसी। अगस्त में आई भीषण बाढ़ ने नेपाल-चीन सीमा पर रसुवागढ़ी-तिमुरे क्षेत्र स्थित ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्प्लेक्स को भारी नुकसान पहुंचाते हुए नेपाल के चीन से जुड़े प्रमुख उत्तरी व्यापार मार्ग को ठप कर दिया है। बाढ़ की चपेट में नेपाल को चीन से जोड़ने वाला मैत्री पुल, सड़कें, घर और कई गांव भी आ गए। व्यापक तबाही के बाद इस क्षेत्र के पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर खर्च होने का अनुमान है, जबकि ग्यिरोंग पोर्ट कॉम्प्लेक्स को दोबारा खड़ा करने में भी कई मिलियन डॉलर की आवश्यकता पड़ सकती है।
बाढ़ से नेपाल का चीन के साथ एकमात्र चालू प्रमुख जमीनी संपर्क भी बाधित हो गया है। इसके अलावा कोदारी-झांगमू सीमा चौकी 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद से ही प्रभावी रूप से बंद है। ऐसे में रसुवागढ़ी-तिमुरे क्रॉसिंग के ठप होने से काठमांडू का चीन के साथ सड़क मार्ग से संपर्क गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने में कई वर्ष लग सकते हैं।
बाढ़ का असर केवल व्यापारिक संपर्क तक सीमित नहीं रहा। पनबिजली परियोजनाओं और ऊर्जा ढांचे को भी व्यापक नुकसान पहुंचा है। कई परियोजनाओं के प्रभावित होने से नेपाल की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में कम से कम 10 प्रतिशत की कमी आने का दावा किया गया है। इससे पुनर्निर्माण की चुनौती और बढ़ गई है।
नेपाल के कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले वर्षों में भारत पर निर्भरता कम करने और चीन के साथ वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करने की जो रणनीति अपनाई गई थी, उसे प्राकृतिक आपदा ने बड़ा झटका दिया है। नेपाल लंबे समय से उत्तरी व्यापार गलियारे को भारत पर निर्भरता घटाने और चीन के विशाल बाजार से सीधे जुड़ने के विकल्प के रूप में देखता रहा है। हालांकि हाल की तबाही ने इस मार्ग की भौगोलिक और आधारभूत संरचनागत कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
इसके विपरीत, भारत से जुड़े बीरगंज और विराटनगर जैसे प्रमुख सीमा व्यापार केंद्र और मार्ग फिलहाल नेपाल के व्यापार और आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बाढ़ प्रभावित रसुवा और नुवाकोट सहित अन्य क्षेत्रों के लिए आपातकालीन सामग्री, ईंधन, भारी निर्माण उपकरण और मशीनरी की आपूर्ति में भारत से जुड़े सड़क मार्ग और भारतीय बंदरगाह महत्वपूर्ण माध्यम बने हुए हैं।
जियोपॉलिटिकल मामलों के विशेषज्ञ ब्रबिम कार्की ने फर्स्टपोस्ट में लिखे अपने लेख में नेपाल की उत्तरी व्यापारिक महत्वाकांक्षा को लगे झटके का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, रसुवागढ़ी के रास्ते होने वाला व्यापार लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक चर्चा के अनुपात में कभी बहुत बड़ा नहीं रहा। चीन नेपाल के आयात का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन नेपाल से चीन को होने वाला निर्यात तुलनात्मक रूप से काफी कम है। वहीं भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है।
उपलब्ध व्यापार आंकड़ों के अनुसार नेपाल के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 64 प्रतिशत बताई जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि चीन के साथ वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करने के प्रयासों के बावजूद नेपाल की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति व्यवस्था में भारत की भूमिका अब भी बेहद महत्वपूर्ण है।
नेपाल के लिए भारत के साथ आर्थिक संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। भारत में काम करने वाले बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक अपने परिवारों को नियमित रूप से धन भेजते हैं, जो बाढ़ जैसी आपदाओं के बाद प्रभावित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा बनता है। सीमा, सड़क संपर्क, व्यापार और श्रम संबंधों के कारण दोनों देशों के बीच गहरे सामाजिक और आर्थिक रिश्ते भी कायम हैं।
हालांकि, इस आपदा का अर्थ यह नहीं है कि नेपाल चीन के निवेश या उत्तरी व्यापार गलियारे की अपनी दीर्घकालिक योजनाओं को पूरी तरह छोड़ देगा। चीन के साथ संपर्क और वैकल्पिक व्यापार मार्ग नेपाल की रणनीतिक प्राथमिकताओं में आगे भी बने रह सकते हैं। लेकिन मौजूदा संकट ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि हिमालय जैसे कठिन भौगोलिक क्षेत्र में किसी वैकल्पिक व्यापार गलियारे को टिकाऊ बनाने के लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और निवेश पर्याप्त हैं या नहीं।
रसुवागढ़ी-तिमुरे मार्ग की तबाही ने नेपाल के सामने एक बड़ी वास्तविकता रख दी है। उत्तरी व्यापार मार्ग प्राकृतिक आपदाओं के प्रति कितना संवेदनशील है, यह बाढ़ ने स्पष्ट कर दिया है। ऐसे में नेपाल के सामने चुनौती केवल क्षतिग्रस्त पुलों और सड़कों के पुनर्निर्माण की नहीं, बल्कि अपनी व्यापारिक और आपूर्ति व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, विविध और आपदा-रोधी बनाने की भी है। आने वाले वर्षों में काठमांडू को भारत और चीन दोनों के साथ अपने आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन बनाते हुए हिमालयी क्षेत्रों के बुनियादी ढांचे की दीर्घकालिक मजबूती पर ध्यान देना होगा।

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