द्वीप पर 10 छिपकलियां छोड़कर भूल गए वैज्ञानिक, 36 साल बाद बदल चुका था छिपकलियों का आकार और खान-पान
वैज्ञानिक जीवों को एक द्वीप से दूसरे द्वीप पर ले जाकर उनके अनुकूलन की जानकारी जमा कर रहे थे, लेकिन यह प्रोजेक्ट बंद हो गया। इसके बाद 10 छिपकलियां एक छोटे से द्वीप पर रह गई थीं। 36 साल बाद उन्होंने आबादी बहुत ज्यादा बढ़ा ली थी।

रोम,एजेंसी। वैज्ञानिकों के एक प्रयोग ने यह दिखाया है कि बदलते पर्यावरण और खान-पान के अनुसार जीवों के शरीर में अपेक्षाकृत कम समय में भी उल्लेखनीय बदलाव हो सकते हैं। वर्ष 1971 में वैज्ञानिकों ने क्रोएशिया के एक छोटे से द्वीप पर इटैलियन वॉल लिजार्ड की पांच नर और पांच मादा, यानी कुल 10 छिपकलियां छोड़ी थीं। करीब तीन दशक से अधिक समय बाद जब वैज्ञानिक दोबारा इस द्वीप पर पहुंचे तो वहां इन छिपकलियों की बड़ी आबादी मौजूद थी। जांच में यह भी सामने आया कि इन छिपकलियों के सिर और जबड़ों की बनावट उनकी मूल आबादी से काफी अलग हो चुकी थी।
वर्ष 1971 में एवियातार नेवो और उनकी टीम ने दक्षिणी एड्रियाटिक सागर में स्थित पोड केपिस्टे नाम की छोटी चट्टानी जगह से इटैलियन वॉल लिजार्ड के पांच जोड़ों को पकड़कर पोड मर्चारू द्वीप पर छोड़ा था। वैज्ञानिक छोटे द्वीपों के बीच जानवरों को स्थानांतरित कर यह अध्ययन करना चाहते थे कि अलग पर्यावरण में कौन सी प्रजाति बेहतर ढंग से अनुकूलित होती है। बाद में यह परियोजना बंद हो गई और द्वीप पर छोड़ी गई छिपकलियों की निगरानी नहीं हो सकी।
2000 के दशक में वैज्ञानिकों की एक टीम दोबारा पोड मर्चारू पहुंची। ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित शोध के अनुसार, एंथनी हेरेल और डंकन इर्शिक की टीम ने पाया कि द्वीप पर इटैलियन वॉल लिजार्ड की बड़ी संख्या में मौजूदगी थी। इस दौरान वहां की एक मूल छिपकली प्रजाति भी समाप्त हो चुकी थी। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की जांच से पुष्टि हुई कि द्वीप पर मौजूद छिपकलियां उन्हीं 10 छिपकलियों की पीढ़ियों से संबंधित थीं, जिन्हें 1971 में वहां लाया गया था।
शोधकर्ताओं ने पाया कि पोड मर्चारू में रहने वाली छिपकलियों के सिर पहले की तुलना में अधिक चौड़े और ऊंचे हो गए थे। इसके साथ ही उनके जबड़ों की काटने की क्षमता भी बढ़ गई थी। वैज्ञानिकों ने इसका संबंध उनके बदल चुके खान-पान से जोड़ा। मूल द्वीप पर ये छिपकलियां मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े खाती थीं और उनके भोजन में पौधों की हिस्सेदारी केवल करीब चार से सात प्रतिशत थी।
पोड मर्चारू में पहुंचने के बाद उनकी भोजन की आदतों में बड़ा बदलाव आया। अध्ययन के मुताबिक, वसंत ऋतु में उनके भोजन में पौधों की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत और गर्मियों में लगभग 61 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसमें लगभग आधा हिस्सा पत्तियों का था, जिनमें सेलुलोज की मात्रा अधिक होती है। पत्तियों को काटने और चबाने के लिए अधिक मजबूत जबड़ों की जरूरत पड़ी। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसी अनुकूलन के साथ जबड़ों की मांसपेशियों को सहारा देने के लिए उनकी खोपड़ी की बनावट में भी बदलाव आया।
यह अध्ययन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि किसी नए पर्यावरण में पहुंचने के बाद जीवों के खान-पान और शारीरिक संरचना में पीढ़ियों के दौरान महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल कुछ दशकों में एक छोटी आबादी में भोजन और पर्यावरण के अनुरूप ऐसे स्पष्ट शारीरिक परिवर्तन दर्ज किए गए।




