तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने खनन कानून में बदलाव का किया विरोध, प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने हाल ही लागू हुए संशोधित खनन कानूनों को विरोध किया है। सीएम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि संशोधित प्रावधान राज्यों के अधिकारों को कम कर रहे हैं।

चेन्नई/एजेंसी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने हाल में लागू खनिज एवं खनन विनियमन कानून, 2026 में किए गए बदलावों को लेकर केंद्र सरकार के समक्ष आपत्ति जताई है। मुख्यमंत्री ने 17 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि संशोधित प्रावधानों से तमिलनाडु सहित कई राज्यों के आर्थिक और प्रशासनिक हित प्रभावित हो सकते हैं।
बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री ने पत्र में संशोधित कानून के उन प्रावधानों पर विशेष चिंता जताई है, जिनसे राज्यों की खनिजों पर कर और उपकर लगाने की शक्तियों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, टीवीके सरकार की ओर से प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने केरल, कर्नाटक, झारखंड सहित अन्य खनिज उत्पादक राज्यों के हितों पर भी संभावित प्रभाव का उल्लेख किया है।
मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर उस प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है, जिसके तहत संशोधित कानून लागू होने की तारीख से खनन संचालकों द्वारा राज्य सरकार को दिए जाने वाले लंबित और बकाया करों को समाप्त करने का प्रावधान किया गया है। उनका तर्क है कि इससे राज्यों के राजस्व हित प्रभावित हो सकते हैं।
विधानसभा में पीएमके विधायक ए. गणेशकुमार के सवाल के जवाब में प्राकृतिक संसाधन मंत्री टी.के. प्रभु ने बताया कि मुख्यमंत्री पहले ही प्रधानमंत्री को पत्र लिख चुके हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए सचिव स्तर पर केंद्र के साथ बातचीत चल रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में तमिलनाडु खनिज-धारी भूमि कर अधिनियम, 2013 और इससे जुड़े नियमों पर संशोधित कानून के संभावित प्रभाव का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि राज्य को 2022-23 में खनिज-धारी भूमि कर से करीब 2,248 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था और इस क्षेत्र से राज्य की आय में लगातार वृद्धि हुई है।
मुख्यमंत्री ने खनिजों पर दोहरे कराधान की संभावित स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। संशोधित प्रावधानों के तहत राज्यों को केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन खनिजों पर कर या उपकर लगाने की अनुमति दी गई है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु ने 2025-26 में खनन एवं खनिजों के विनियमन से जुड़े क्षेत्र से करीब 4,356 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया। राज्य ने 2026-27 में इस राजस्व को लगभग 11,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
खनन कानून के अलावा तमिलनाडु सरकार कई अन्य राष्ट्रीय और अंतरराज्यीय मुद्दों पर भी केंद्र के समक्ष अपनी आपत्तियां रखती रही है।
परिसीमन का विरोध: प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राज्य सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या को स्थायी रूप से 543 पर बनाए रखने की मांग की है। राज्य का तर्क है कि बेहतर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों को परिसीमन से राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर नुकसान नहीं होना चाहिए।
मेकेदातु बांध परियोजना: तमिलनाडु ने कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का विरोध किया है और केंद्र सरकार से परियोजना को अनुमति नहीं देने का आग्रह किया है।
विकसित भारत गारंटी योजना: मनरेगा के स्थान पर प्रस्तावित नई योजना के वित्तीय ढांचे पर भी तमिलनाडु ने आपत्ति जताई है। राज्य का कहना है कि नई व्यवस्था से तमिलनाडु पर 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून: खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावित बदलावों का भी राज्य ने विरोध किया है। सरकार को आशंका है कि इससे राज्य के गरीब परिवारों को मिलने वाले खाद्यान्न के कोटे पर असर पड़ सकता है।
नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन में हिस्सेदारी: तमिलनाडु सरकार ने केंद्र से नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन में अपनी हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
खनन कानून में संशोधन को लेकर मुख्यमंत्री विजय की आपत्तियों के बाद केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच इस मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ने की संभावना है। राज्य सरकार का जोर खनिज संसाधनों से होने वाले राजस्व पर अपने अधिकार और वित्तीय हितों की रक्षा पर है, जबकि संशोधित केंद्रीय कानून के प्रावधानों को लेकर राज्यों की शक्तियों और केंद्र के अधिकार क्षेत्र पर व्यापक बहस शुरू हो गई है।




