Jauhar Diwas: जौहर दिवस पर याद की गई चित्तौड़ की ऐतिहासिक गाथा, पद्मिनी के प्रसंग ने फिर खींचा ध्यान
26 अगस्त का दिन जौहर दिवस के रूप में जाना जाता है। जब जौहर की बात होती है तो राजस्थान की वीरगाथाओं को भूलकर भी भुलाया नहीं जा सकता।

जयपुर/एजेंसी। राजस्थान के इतिहास में 26 अगस्त का दिन चित्तौड़गढ़ की जौहर परंपरा और वीरगाथाओं की स्मृति से जुड़ा है। जौहर दिवस के अवसर पर रानी पद्मिनी और चित्तौड़गढ़ से जुड़े उस प्रसंग को याद किया जाता है, जिसमें युद्ध की विषम परिस्थितियों के बीच महिलाओं द्वारा सम्मान और अस्मिता की रक्षा के लिए जौहर किए जाने की कथा सामने आती है। हालांकि रानी पद्मिनी के ऐतिहासिक अस्तित्व और उनसे जुड़ी घटनाओं को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं, लेकिन लोक परंपराओं और साहित्य में यह प्रसंग लंबे समय से दर्ज रहा है।
इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार वर्ष 1303 में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। उस समय रावल रतन सिंह चित्तौड़ के शासक थे। लंबे संघर्ष और किले की घेराबंदी के बाद चित्तौड़ की स्थिति कमजोर पड़ गई। इसी दौर से जुड़ी लोकगाथाओं में रानी पद्मिनी और चित्तौड़ की महिलाओं द्वारा जौहर किए जाने का उल्लेख मिलता है।
जौहर को मध्यकालीन युद्धकाल की एक कठोर और दुखद परंपरा के रूप में देखा जाता है। ऐसी मान्यता थी कि जब किसी किले की हार निश्चित हो जाती थी और महिलाओं के बंदी बनाए जाने या उनके साथ अपमानजनक व्यवहार की आशंका होती थी, तब महिलाएं सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देती थीं। इसके बाद पुरुष योद्धा केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध के लिए निकलते थे। राजपूत इतिहास और लोक स्मृति में इस परंपरा को शौर्य, स्वाभिमान और अस्मिता से जोड़कर देखा गया है।
रानी पद्मिनी के जौहर का सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक उल्लेख मलिक मोहम्मद जायसी की वर्ष 1540 में रचित कृति ‘पद्मावत’ में मिलता है। यह रचना चित्तौड़ की घटनाओं के करीब दो शताब्दी बाद लिखी गई थी और इसमें साहित्यिक एवं काव्यात्मक तत्व भी मौजूद हैं। ऐसे में इतिहासकार पद्मिनी और जौहर की कथा को समझते समय साहित्यिक रचनाओं, लोक परंपराओं और समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
जौहर दिवस के अवसर पर चित्तौड़ की गाथा को केवल युद्ध और बलिदान के प्रसंग के रूप में नहीं, बल्कि मध्यकालीन समाज, युद्धकालीन परिस्थितियों, महिलाओं की स्थिति और तत्कालीन राजपूत संस्कृति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में भी देखा जाता है। चित्तौड़गढ़ से जुड़ी यह गाथा राजस्थान की लोक स्मृति में आज भी गहरी छाप रखती है।
राजस्थान का जैसलमेर भी जौहर और साके की ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा रहा है। इतिहास में जैसलमेर दुर्ग में दो प्रमुख जौहर का उल्लेख मिलता है। पहला जौहर वर्ष 1299 में अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान दुर्ग की लंबी घेराबंदी के बीच हुआ बताया जाता है। इसके बाद वर्ष 1326 में तुगलक वंश के शासनकाल के दौरान दूसरे जौहर का उल्लेख मिलता है।
इन घटनाओं से जुड़ी ऐतिहासिक और लोक परंपराओं में बताया जाता है कि युद्ध में पराजय की स्थिति के बीच महिलाओं ने जौहर किया और पुरुष योद्धा केसरिया धारण कर अंतिम संघर्ष के लिए रणभूमि में उतरे। राजस्थान के विभिन्न दुर्गों से जुड़ी ये गाथाएं आज भी इतिहास, लोक संस्कृति और सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।




