बिलासपुर में 17 करोड़ के सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच तेज, प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में

बिलासपुर/छत्तीसगढ़। बिलासपुर जिले में सामने आए 17 करोड़ रुपये के सर्पदंश मुआवजा घोटाले की आंच अब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच गई है। तहसील और एसडीएम कार्यालय के तीन लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब एडीएम, एसडीएम और तहसीलदार की भूमिका की भी जांच कर रही है। मामले में सिम्स के पांच चिकित्सकों से भी पूछताछ की तैयारी की जा रही है।
मंगलवार देर रात दो नगर सैनिकों की गिरफ्तारी के साथ इस मामले में अब तक सिम्स की महिला डॉक्टर प्रियंका सोनी, तीन लिपिक, तीन अधिवक्ता सहित कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। वहीं, सिम्स के फोरेंसिक विभाग के डॉ. नारायण गोले संदेह के दायरे में हैं और मोबाइल बंद कर फरार बताए जा रहे हैं। मामले का मुख्य षड़यंत्रकर्ता अधिवक्ता श्रवण वस्त्रकार भी अभी पुलिस की पकड़ से बाहर है।
जांच में सामने आया है कि वर्ष 2021 से 2024 के बीच सामान्य मौतों को सर्पदंश से मौत बताकर 431 प्रकरणों में करीब 17 करोड़ 24 लाख रुपये का मुआवजा प्राप्त किया गया। सिम्स अस्पताल की कथित रूप से कूटरचित पोस्टमार्टम रिपोर्ट और गलत नाम-पते के आधार पर फांसी, हार्ट अटैक और आत्महत्या जैसी मौतों को सर्पदंश बताकर प्रत्येक मामले में चार-चार लाख रुपये की सरकारी राशि हड़पी गई।
पुलिस जांच में डॉक्टरों, अधिवक्ताओं, बैंककर्मियों, मुंशियों और बिचौलियों के संगठित रैकेट का खुलासा हुआ है। बताया जा रहा है कि सिम्स में किसी मरीज की मौत के बाद वहां तैनात कुछ गार्ड और नगर सैनिक बिचौलियों और वकीलों को सूचना देते थे। इसके बाद परिजनों को मुआवजे का लालच देकर फंसाया जाता था और डॉक्टरों की मिलीभगत से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण बदलकर सर्पदंश दर्शाया जाता था। लिपिकों की मदद से मुआवजा प्रकरण तैयार कर राशि स्वीकृत कराई जाती थी और बाद में रकम का बंटवारा कर लिया जाता था।
तीन लिपिकों नरेंद्र कौशिक, हरिशंकर राठौर और गरीब राम बिंझवार को जेल भेजे जाने के बाद अब पुलिस यह जांच कर रही है कि एडीएम, एसडीएम, तहसीलदार और पटवारी के हस्ताक्षर और अनुशंसा के बिना इतनी बड़ी राशि कैसे स्वीकृत हो गई। इसी आधार पर संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई गई है।
इस बीच लिपिकों की गिरफ्तारी के विरोध में लिपिक संघ ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संघ के प्रदेश पदाधिकारी रोहित तिवारी ने आरोप लगाया कि बड़े अधिकारियों को बचाने के लिए छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाया जा रहा है।
सिम्स के डीन डॉ. रमणेश मूर्ति ने कहा कि अब सभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट की फोरेंसिक जांच कराई जाएगी और गड़बड़ी पाए जाने पर संबंधित डॉक्टरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मुआवजा वितरण में अनियमितताओं की शिकायतों पर कराई गई प्रशासनिक जांच में 17 मामलों की पड़ताल के बाद 16 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और इसमें शामिल अन्य लोगों के खिलाफ भी जल्द कार्रवाई की जाएगी।




