सड़क पर ‘रील’ का जोखिम: दिल्ली की बसों में प्राइवेट ड्राइवरों की मनमानी और सुरक्षा पर बड़े सवाल

यह एक गंभीर विषय है। सोशल मीडिया पर रील बनाने के चक्कर में सड़क सुरक्षा और महिला सुरक्षा से खिलवाड़ वाकई चिंताजनक है।

दिल्ली ब्यूरो। राजधानी की सड़कों पर दौड़ती बसें अब सिर्फ सफर का जरिया नहीं, बल्कि कुछ ड्राइवरों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बन गई हैं। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ क्लस्टर (नारंगी/नीली) और डीटीसी की बसों में तैनात प्राइवेट ड्राइवर चलती बस में रील बना रहे हैं। यह न केवल सड़क सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है, बल्कि बसों में सफर करने वाली महिलाओं की निजता (Privacy) का भी सीधा हनन है।
अनिवार्य योग्यताओं को ताक पर रखने के आरोप
स्थानीय नागरिकों और जानकारों का दावा है कि इन ड्राइवरों की भर्ती प्रक्रिया में बड़ी खामियां हैं। नियमों के मुताबिक, भारी वाहन चलाने के लिए कम से कम 3 साल का अनुभव, वैध लाइसेंस, प्रॉपर बैच और मेडिकल फिटनेस अनिवार्य है। लेकिन आरोप लग रहे हैं कि प्राइवेट कंपनियों के जरिए भर्ती किए गए अधिकतर ड्राइवर इन मानकों को पूरा नहीं करते। इनमें से कई ड्राइवरों के पास न तो पर्याप्त अनुभव है और न ही आवश्यक योग्यता, फिर भी वे दिल्ली की लाइफलाइन कही जाने वाली बसों को दौड़ा रहे हैं।
महिलाओं की निजता और सोशल मीडिया का ‘नशा’
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रीलें एक खौफनाक ट्रेंड की ओर इशारा कर रही हैं। एक रील को देखकर दूसरा ड्राइवर भी उसी की नकल कर रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि कई ड्राइवरों ने कैमरे के सामने यह तक स्वीकार किया कि वे इस नौकरी में केवल मनोरंजन और ‘लड़कीबाजी’ के उद्देश्य से आए हैं। सफर के दौरान महिला यात्रियों की अनुमति के बिना उनकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना उनकी सुरक्षा और सम्मान पर बड़ा प्रहार है।
प्राइवेटाइजेशन और जवाबदेही का अभाव
बसों के निजीकरण ने जवाबदेही के तंत्र को कमजोर कर दिया है। सरकारी बस ड्राइवरों के विपरीत, ये प्राइवेट ड्राइवर अपनी नौकरी जाने का डर नहीं रखते। उनका मानना है कि एक कंपनी से निकाले जाने पर वे दूसरी प्राइवेट एजेंसी में काम पा लेंगे। इसी बेखौफी के कारण वे सड़क पर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने और रोकने-टोकने पर अभद्र व्यवहार करने से भी नहीं कतराते।
सबसे बड़ा सवाल दिल्ली सरकार और परिवहन विभाग पर उठता है। क्या सरकार ने प्राइवेट कंपनियों को ड्राइवरों की भर्ती की खुली छूट देकर जनता की सुरक्षा को ताक पर रख दिया है? भर्ती प्रक्रिया की निगरानी क्यों नहीं की जा रही?
नागरिकों की मांग:
सभी प्राइवेट ड्राइवरों के लाइसेंस और अनुभव प्रमाण पत्रों की तत्काल उच्च स्तरीय जांच हो।
ड्यूटी के दौरान मोबाइल के इस्तेमाल और रील बनाने वाले ड्राइवरों पर परमानेंट बैन लगाया जाए।
बसों में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सख्त गाइडलाइंस जारी की जाएं।
सड़क सुरक्षा सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि हजारों लोगों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है। अगर समय रहते इन ‘रीलबाज’ ड्राइवरों पर लगाम नहीं कसी गई, तो दिल्ली की सड़कें किसी बड़े हादसे का गवाह बन सकती हैं।

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