मुजफ्फरनगर का कवाल कांड, जिसने बदल कर रख दी पश्चिम उत्तर प्रदेश की पूरी सियासत

मुजफ्फरनगर,(उत्तर प्रदेश)। मुजफ्फरनगर की एक अदालत ने मंगलवार को साल 2013 में मुजफ्फरनगर के कवाल में हुए दंगे  में बीजेपी विधायक विक्रम सैनी को दोषी ठहराया। 12 आरोपियों समेत उन्‍हें उपद्रव और सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में दो-दो साल की सजा सुनाई है। वहीं सभी पर 10-10 हजार का जुर्माना भी लगाया है। मामले में 15 अन्य आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए हैं। चूंकि सजा 3 साल से कम थी इसलिए विक्रम सैनी को कोर्ट से जमानत भी मिल गई।इन दंगों में करीब 60 लोगों की मौत हुई थी और करीब 50 हजार लोग रिफ्यूजी बनकर शरणार्थी कैंपों में रहने को मजबूर हुए थे। इन दंगों का असर पश्चिम यूपी के सांप्रदायिक सौहार्द्र पर पड़ा। मुस्लिम और जाट समुदाय के बीच कड़वाहट ऐसी घुली कि अब तक रिश्‍ते पूरी तरह सामान्‍य नहीं हो सके। यह दंगा यूपी के इतिहास के सबसे भयावह दंगों में से एक था। हालात हाथ से इतने बाहर चले गए थे कि प्रदेश सरकार की मशीनरी लगभग फेल हो गई और सेना की मदद से शांति व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो पाई।
जानसठ के कवाल गांव में घटी एक घटना
इस दंगे के मूल में जानसठ कोतवाली क्षेत्र के गांव कवाल की एक घटना है, 26 अगस्‍त 2013 को बाइक और साइकिल की भिडंत में मुजस्सिम और गौरव नाम के शख्‍स के बीच कहासुनी हुई। इसके पीछे भी किसी लड़की से छेड़ने की घटना जुड़ी बताई जाती है। यह लड़की सचिन और गौरव की रिश्‍तेदार थी। अगले दिन यानी 27 अगस्‍त को इसी विवाद में शाहनवाज और सचिन, गौरव की मारपीट हुई। शाहनवाज की चाकू लगने से मौत हो गई। इसके बाद शाहनवाज की ओर से सचिन और गौरव की कवाल के मुख्‍य चौराहे पर पीट-पीटकर हत्‍या कर दी गई। सचिन और गौरव जाट समुदाय के युवक थे।

लखनऊ से आया एक फोन और बिगडे़ हालात
इसी रात तत्‍कालीन डीएम सुरेंद्र कुमार और एसएसपी मंजिल सैनी के निर्देशन में सचिन-गौरव की हत्‍या के कई संदिग्‍धों को पुलिस ने पकड़ लिया। यहीं से इस पूरे मामले में राजनीतिक दखलंदाजी शुरू हुई। बताया जाता है कि सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के एक बडे़ नेता ने लखनऊ से फोन किया और ये लोग छूट गए।
बदल दिए गए आला अधिकारी
इतना ही नहीं 28 अगस्‍त की सुबह डीएम और एसएसपी का ट्रांसफर कर दिया गया। इनकी जगह आए कौशलराज शर्मा और एसएसपी सुभाषचंद दुबे। इसी दिन सचिन-गौरव के अंतिम संस्‍कार से लौट रही भीड़ ने कवाल में घुसकर तोड़फोड़, पथराव और आगजनी कर दी। इस घटना के विरोध में 30 अगस्‍त को मोहल्ला खालापार में जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम नेताओं ने डीएम-एसएसपी को ज्ञापन सौंपा। इस सभा में भड़काऊ भाषण और नारेबाजी हुई। इसके जवाब में 31 अगस्‍त को जाटों और हिंदूवादी संगठनों ने सिखेड़ा के गांव नंगला मंदौड़ के कॉलेज मैदान में एक पंचायत आयोजित की।
7 सितंबर को महापंचायत से सुलगी चिंगारी
आग धीरे-धीरे सुलग रही थी, 7 सितंबर को भारतीय किसान यूनियन और दूसरे हिंदूवादी संगठनों ने फिर से नंगला मंदौड़ कॉलेज के मैदान में बहू-बेटी सम्‍मान बचाओ महापंचायत का आयोजन किया। हालांकि प्रशासन के दबाव में आयोजन से ठीक पहले किसान यूनियन पीछे हट गई। प्रशासन ने कोशिश की कि लोगों को इस सभा में न जाने दिया जाए लेकिन नाकाम रहा। लाखों की संख्‍या में भीड़ जुटी। इस बीच महापंचायत में पहुंचे कुछ लोगों पर रास्‍ते में दूसरे समुदाय के लोगों ने हमला करके घायल कर दिया। इन्‍हें देखकर महापंचायत में आक्रोश फैल गया। जल्‍दी-जल्‍दी महापंचायत खत्‍म कराई गई।

चिंगारी से दंगे की आग भड़क उठी
लेकिन हालात तब हाथ से बाहर हो गए जब महापंचायत से लौटते लोगों पर गांव जौली में गंगनहर पटरी और दूसरे गांवों में हमले किए गए। यह झड़प दंगे में बल गई जिसकी आंच में ग्रामीण इलाकों के साथ शहरी क्षेत्र भी आ गया। कई लोग मारे गए, बड़ी संख्‍या में लोग घायल हुए। देर रात पूरे जिले में दंगा फैल गया। 7 सितंबर को शुरू हुआ हिंसा का यह खेल 9 सितंबर को इतने चरम पर था कि राज्‍य सरकार ने पूरा जिला सेना के हवाले कर दिया। इस दंगे में करीब 50 हजार लोगों ने अपने घर-बार छोड़ दिए और पलायन कर गए। कई जगह रिफ्यूजी कैंप लगाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में प्रदेश को तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को फटकार लगाई।

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