30 साल से नामांतरण का इंतजार, कलेक्टर के आदेश की प्रति लेकर जनसुनवाई में पहुंचा किसान परिवार
गुना में एक परिवार 30 साल से न्याय के लिए भटक रहा है लेकिन अभी तक उसे न्याय नहीं मिला। परिवार मंगलवार को कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में पहुंचा और मामले में कार्रवाई की मांग की है।

गुना,मध्य प्रदेश। जिला मुख्यालय पर मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में प्रशासनिक कार्यप्रणाली से जुड़ा एक मामला सामने आया, जिसमें एक किसान परिवार करीब 30 साल पुराने आदेश के बावजूद अपनी जमीन के नामांतरण के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। राघौगढ़ तहसील के धरनावदा गांव निवासी रतिराम कुशवाह अपने परिवार के साथ गले में मांग संबंधी तख्तियां और तत्कालीन कलेक्टर के आदेश की प्रति लेकर कलेक्टोरेट पहुंचे और जमीन का नामांतरण कराने की मांग की।
रतिराम कुशवाह के अनुसार, उनके पिता पूरनलाल कुशवाह ने वर्ष 1996 में धरनावदा पुलिस थाने के भवन निर्माण के लिए अपनी जमीन शासन को दी थी। इसके बदले शासन की ओर से सर्वे नंबर 33 की शासकीय भूमि देने का आदेश हुआ था। तत्कालीन कलेक्टर इकबाल सिंह बैंस ने 16 जुलाई 1996 को आदेश जारी कर पूरनलाल की भूमि पुलिस थाने के नाम दर्ज करने के साथ बदले में सर्वे नंबर 33 की शासकीय भूमि उनके नाम किए जाने तथा राजस्व अभिलेखों में आवश्यक प्रविष्टि के निर्देश दिए थे।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि कलेक्टर के आदेश के बाद उनकी मूल जमीन तो सरकारी रिकॉर्ड में धरनावदा थाने के नाम दर्ज कर दी गई, लेकिन बदले में दी गई सर्वे नंबर 33 की भूमि आज तक उनके नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं हो सकी। पूरनलाल कुशवाह का वर्ष 2018 में निधन हो चुका है। इसके बाद उनके पुत्र रतिराम इस मामले के समाधान के लिए लगातार अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं।
रतिराम का कहना है कि अधिकारियों के स्तर पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। उनके मुताबिक, तहसीलदार की ओर से जमीन उनके नाम दर्ज होने की बात कही जाती है, जबकि हल्का पटवारी के रिकॉर्ड में उनके नाम कोई जमीन दर्ज नहीं होने की जानकारी दी जाती है। इसी विरोधाभास से परेशान होकर परिवार को जनसुनवाई में अपनी समस्या सार्वजनिक रूप से उठानी पड़ी।
रतिराम कुशवाह ने जिला कलेक्टर से मांग की है कि वर्ष 1996 में जारी विनिमय संबंधी आदेश का रिकॉर्ड के आधार पर तत्काल परीक्षण कराया जाए और यदि आदेश के अनुरूप प्रक्रिया लंबित है तो सर्वे नंबर 33 की भूमि का नियमानुसार उनके नाम नामांतरण कराया जाए। परिवार का कहना है कि तीन दशक पुराने मामले का अब शीघ्र निराकरण होना चाहिए।




