मध्य प्रदेश में बढ़ते कैंसर के बीच खान-पान, जीवनशैली और परिवारों पर बढ़ते असर को लेकर चिंतन जरूरी
महंगे इलाज से आर्थिक संकट, माता-पिता को खोने वाले बच्चों के भविष्य के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा की जरूरत

अनूपपुर/मध्य प्रदेश। मध्य प्रदेश में कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर अब केवल चिकित्सा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, खान-पान, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और कैंसर से प्रभावित परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। कैंसर अब केवल मरीज तक सीमित रहने वाली बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर पूरे परिवार की आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति पर पड़ता है।
कैंसर का उपचार कई बार लंबे समय तक चलता है। महंगी जांच, ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, दवाइयों और अस्पताल तक आने-जाने में होने वाला खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। यदि मरीज परिवार का कमाने वाला सदस्य हो तो बीमारी के कारण आय प्रभावित होती है। कई मामलों में मरीज की देखभाल के लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी रोजगार छोड़ना पड़ सकता है। इससे बचत खत्म होने, कर्ज लेने और संपत्ति बेचने जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।
बीमारी के साथ परिवार भी झेलता है मानसिक और सामाजिक संघर्ष
कैंसर का असर आर्थिक स्थिति के साथ परिवार के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। इलाज, बीमारी के भविष्य और खर्च को लेकर परिवार के सदस्यों में लगातार चिंता बनी रहती है। बच्चों की पढ़ाई, रोजगार, घरेलू जिम्मेदारियां और सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो सकते हैं।
सबसे गंभीर स्थिति उन परिवारों की होती है, जहां कैंसर के कारण पति-पत्नी दोनों की मृत्यु हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों के सामने पढ़ाई, पालन-पोषण, स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर गंभीर चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। कई बच्चे रिश्तेदारों या बुजुर्गों के सहारे रह जाते हैं, लेकिन प्रत्येक परिवार लंबे समय तक उनका आर्थिक भार उठाने की स्थिति में नहीं होता। ऐसे बच्चों के भविष्य के लिए प्रभावी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है।
बदलती जीवनशैली और खान-पान भी चिंता का विषय
वर्तमान समय में लोगों की जीवनशैली तेजी से बदल रही है। शारीरिक गतिविधियां कम हो रही हैं, जबकि तनाव, मोटापा और अनियमित दिनचर्या बढ़ रही है। इसके अलावा तंबाकू, गुटखा, खैनी, धूम्रपान और शराब जैसी आदतें गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती हैं। विशेष रूप से तंबाकू का सेवन कैंसर के प्रमुख ज्ञात जोखिम कारकों में शामिल है।
खान-पान की आदतों में भी बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक और ताजे भोजन की तुलना में फास्ट फूड तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ रहा है। पिज्जा, बर्गर, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेट वाले स्नैक्स, अत्यधिक तला-भुना भोजन, अधिक नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थ तथा मीठे पेय बच्चों और युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को सीधे कैंसर का कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है, लेकिन लंबे समय तक अस्वास्थ्यकर खान-पान, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता कई स्वास्थ्य समस्याओं तथा कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
खेत से थाली तक खाद्य सुरक्षा पर निगरानी जरूरी
खेत से लेकर उपभोक्ता की थाली तक पहुंचने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सब्जियों और फलों में अनुचित तरीके से रसायनों के इस्तेमाल, पशुपालन में दवाइयों या एंटीबायोटिक के गलत उपयोग तथा खाद्य पदार्थों में मिलावट जैसी चिंताएं समय-समय पर सामने आती रही हैं।
हालांकि हर सब्जी या दूध में इंजेक्शन अथवा किसी विशेष रसायन के इस्तेमाल की बात कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। किसी पदार्थ को सीधे कैंसर का कारण बताने के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक हैं। इसलिए अफवाहों के बजाय खाद्य पदार्थों की नियमित वैज्ञानिक जांच, खाद्य सुरक्षा के मानकों का पालन और मिलावट के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।
सस्ती और सुलभ चिकित्सा व्यवस्था की जरूरत
कैंसर के उपचार के लिए देश में सरकारी योजनाएं और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जरूरतमंद परिवारों तक समय पर और आसानी से उपचार तथा आर्थिक सहायता पहुंचना बड़ी चुनौती है। कैंसर से जूझ रहे परिवारों को दवाइयों, जांच, अस्पताल के खर्च और आय के नुकसान का भी सामना करना पड़ता है।
ऐसे में कैंसर की रोकथाम और शुरुआती जांच के साथ सस्ती एवं सुलभ चिकित्सा, आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता, बेहतर कैंसर उपचार केंद्र और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार जरूरी है। इसके साथ ही मरीज के परिवार और विशेष रूप से बच्चों के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।तंबाकू और नशे पर प्रभावी नियंत्रण, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की नियमित जांच तथा स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करने वाले कारकों पर निगरानी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
बीमारी से पहले जागरूकता जरूरी
कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पताल और चिकित्सकों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और सरकार को मिलकर इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ जीवनशैली, तंबाकू और नशे से दूरी तथा आवश्यकता के अनुसार समय पर चिकित्सकीय जांच इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
एडवोकेट सुमिता शर्मा, अध्यक्ष स्थानीय शिकायत समिति अनूपपुर ने कहा कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई केवल मरीज की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की लड़ाई है। एक व्यक्ति बीमारी से जूझता है, लेकिन उसका आर्थिक, मानसिक और सामाजिक बोझ पूरा परिवार उठाता है। यदि बीमारी माता-पिता दोनों को छीन लेती है, तो पीछे रह गए बच्चों का भविष्य भी समाज और व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी बन जाता है।




