सावन की फुहार, हरियाली का श्रृंगार, प्रकृति बचेगी तभी सजेगा संसार,आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

सुमिता शर्मा/जिला ब्यूरो चीफ
अनूपपुर/मध्य प्रदेश। सावन केवल भगवान शिव की आराधना और धार्मिक आस्था का महीना नहीं, बल्कि प्रकृति के नव श्रृंगार और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला अवसर भी है। वर्षा की बूंदों के साथ जब धरती हरी चादर ओढ़ती है और पेड़-पौधे नई ऊर्जा से खिल उठते हैं, तब सावन मानव जीवन और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का एहसास कराता है। भारतीय संस्कृति में सावन का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है, वहीं यह जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की जिम्मेदारी का भी संदेश देता है।
सावन में हरे रंग का विशेष महत्व माना जाता है। हरा रंग प्रकृति, हरियाली, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक है। चारों ओर फैली हरियाली के कारण सावन में महिलाओं के श्रृंगार में भी हरे रंग का विशेष स्थान रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव को समर्पित है। इस दौरान हरे रंग के वस्त्र पहनने और हरी चूड़ियां धारण करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। सावन का हरा रंग जहां प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक है, वहीं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जुड़ाव का संदेश भी देता है।
महिला एवं बाल विकास विभाग की सहायक संचालक मंजूषा शर्मा ने कहा कि सावन पौधरोपण के लिए सबसे अनुकूल समय है। इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम एक पौधा लगाने के साथ उसकी नियमित देखभाल और संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने ‘एक पेड़ बेटी के नाम’ जैसे अभियानों के माध्यम से पौधरोपण को भावनात्मक जुड़ाव से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी से पौधरोपण, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसे प्रयासों को जनअभियान का रूप दिया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण किसी एक व्यक्ति या विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। आज लगाया गया पौधा आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, शीतल छाया और बेहतर वातावरण का आधार बनेगा।
महिला एवं बाल विकास विभाग की पर्यवेक्षक सीमा सिंह ने कहा कि सावन की हरियाली हमें प्रकृति के महत्व का संदेश देती है। बच्चों और महिलाओं को पौधरोपण, पौधों की देखभाल, जल संरक्षण और स्वच्छता जैसी गतिविधियों से जोड़कर उनमें पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जा सकती है। केवल पौधा लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर, कार्यस्थल, विद्यालय या सार्वजनिक स्थान के आसपास कम से कम एक पौधे की जिम्मेदारी ले तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र में हरियाली का विस्तार किया जा सकता है।
स्थानीय परिवार समिति की अध्यक्ष एडवोकेट सुमिता शर्मा ने कहा कि सावन आस्था, संस्कृति और प्रकृति के अद्भुत संगम का पर्व है। भगवान शिव को जल अर्पित करने की परंपरा हमें जल के महत्व का भी संदेश देती है। इसलिए सावन में पूजा-अर्चना के साथ जल की प्रत्येक बूंद बचाने, पौधे लगाने और आसपास स्वच्छता बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रकृति सुरक्षित होगी तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। पर्यावरण संरक्षण को केवल किसी अभियान तक सीमित न रखते हुए इसे दैनिक जीवन की आदत बनाना जरूरी है।
एडवोकेट आकांक्षा शर्मा ने कहा कि सावन लोगों को प्रकृति के करीब आने और उसके संरक्षण का अवसर देता है। पौधरोपण केवल एक दिन की गतिविधि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी है। प्रत्येक व्यक्ति यदि एक पौधा लगाए और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित करे तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
उन्होंने लोगों से सावन के दौरान अधिक से अधिक पौधे लगाने, उनकी नियमित देखभाल करने और जल संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने की अपील की।
वर्षा ऋतु में मिट्टी में पर्याप्त नमी रहने के कारण सावन को पौधरोपण के लिए अनुकूल माना जाता है। हालांकि केवल पौधा लगा देना ही पर्याप्त नहीं है। लगाए गए पौधों को नियमित देखभाल, सुरक्षा और आवश्यकता के अनुसार पानी की जरूरत होती है। सार्वजनिक स्थानों, स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, घरों और आसपास के क्षेत्रों में पौधरोपण कर हरियाली बढ़ाई जा सकती है।
पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड लगाने, नियमित निगरानी करने और समय-समय पर उनकी देखभाल करने की भी आवश्यकता है। पौधरोपण तभी सार्थक होगा, जब लगाए गए पौधे सुरक्षित रहकर वृक्ष का रूप लें।
सावन में जल संरक्षण को भी प्रमुख संकल्प बनाया जा सकता है। वर्षा जल का संग्रहण, तालाबों और जलस्रोतों की स्वच्छता, पानी की बर्बादी रोकना और प्लास्टिक के उपयोग को कम करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। वर्षा जल का समुचित उपयोग भविष्य में जल संकट को कम करने में भी सहायक हो सकता है।
सावन की आस्था को यदि प्रकृति संरक्षण से जोड़ दिया जाए तो यह पर्व सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकता है। धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाकर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जा सकती है।
सावन का संदेश केवल हरियाली को देखने तक सीमित नहीं, बल्कि उसे बचाने और बढ़ाने का भी है। भगवान शिव की आराधना के साथ प्रकृति की सेवा, जल संरक्षण और पौधरोपण का संकल्प लेकर प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका निभा सकता है। सामूहिक प्रयासों से ही आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हरा-भरा भविष्य तैयार किया जा सकता है।




