ईश्वर’ या ‘सत्यनिष्ठा’ के अलावा किसी अन्य नाम पर ली गई शपथ अमान्य: केरल हाई कोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधियों द्वारा कानूनन निर्धारित प्रारूप से हटकर ली गई शपथ को अमान्य घोषित किया है।

तिरुवनंतपुरम/एजेंसी। केरल हाई कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील फैसले में स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधियों द्वारा कानूनन निर्धारित प्रारूप से हटकर ली गई शपथ वैध नहीं मानी जाएगी। न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने तिरुवनंतपुरम निगम के 20 भाजपा पार्षदों और पलक्कड़ जिले के एक पंचायत सदस्य की शपथ को अमान्य घोषित कर दिया है। मामले में पाया गया कि संबंधित जनप्रतिनिधियों ने निर्धारित शब्दों ‘ईश्वर’ या ‘सत्यनिष्ठा’ के स्थान पर स्थानीय देवी-देवताओं, ‘भारत माता’, राजनीतिक आंदोलनों में शहीद हुए नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के नाम पर शपथ ली थी। अदालत ने कहा कि शपथ केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संविधान और कानून के प्रति निष्ठा का सार्वजनिक वचन है।
अदालत ने अपने फैसले में भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप और संत श्री नारायण गुरु के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्तिगत आस्था का सम्मान है, लेकिन विधिक प्रक्रिया में मनमाने बदलाव स्वीकार्य नहीं हो सकते। हालांकि, अदालत ने लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान करते हुए संबंधित पार्षदों और पंचायत सदस्य के चुनाव को रद्द करने से इनकार किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी प्रभावित जनप्रतिनिधियों को चार सप्ताह के भीतर विधि सम्मत प्रारूप में पुनः शपथ लेने का अवसर दिया जाए। अदालत ने यह भी माना कि यह त्रुटि जानबूझकर नहीं की गई थी, बल्कि कानूनी वैधता के विश्वास में हुई थी, इसलिए किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई या जुर्माना नहीं लगाया जाएगा।
फैसले में एक तकनीकी पहलू भी सामने आया। केरल नगर पालिका अधिनियम की धारा 531 के तहत तिरुवनंतपुरम के पार्षदों द्वारा अब तक किए गए सभी प्रशासनिक कार्यों को वैधता प्रदान की गई है। वहीं, वडक्कनचेरी ग्राम पंचायत सदस्य के मामले में पंचायत राज अधिनियम में ऐसी कोई सुरक्षा न होने के कारण उनके पूर्व कार्यों को अमान्य करार दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोबारा शपथ लेने के बाद सभी जनप्रतिनिधि अपने पद पर सामान्य रूप से कार्य जारी रख सकेंगे। इस फैसले को संविधान की मर्यादा और कानून के शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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