क्रेडिट कार्ड ईएमआई के ‘नो-कॉस्ट’ ऑफर का सच, छिपे शुल्क बढ़ा सकते हैं खर्च

क्रेडिट कार्ड ईएमआई और 'नो-कॉस्ट ईएमआई' में अक्सर छिपे शुल्क होते हैं, जिससे उपभोक्ता को लगता है कि वे ज्यादा पैसे दे रहे हैं। ब्याज, प्रोसेसिंग फीस, फोरक्लोजर चार्ज और इन पर लगने वाला जीएसटी आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है, इसलिए खरीदारी से पहले पूरी जानकारी लें।

नई दिल्ली। आज के दौर में क्रेडिट कार्ड का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और महंगी खरीदारी के लिए ईएमआई (इक्वेटेड मंथली इंस्टॉलमेंट) एक आसान विकल्प बन चुका है। खासकर ‘नो-कॉस्ट ईएमआई’ जैसे आकर्षक ऑफर लोगों को तुरंत खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन हकीकत में यह सुविधा पूरी तरह मुफ्त नहीं होती और इसके पीछे कई छिपे शुल्क जुड़े होते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब ग्राहक किसी सामान को ईएमआई पर खरीदते हैं, तो उन्हें केवल मासिक किश्त ही नहीं, बल्कि कई अतिरिक्त शुल्क भी चुकाने पड़ते हैं। सामान्य ईएमआई पर बैंक 13 से 18 प्रतिशत तक का वार्षिक ब्याज वसूलते हैं, जिससे वस्तु की कुल कीमत बढ़ जाती है।
‘नो-कॉस्ट ईएमआई’ के नाम पर भी उपभोक्ताओं को भ्रमित किया जाता है। कई मामलों में उत्पाद की कीमत में पहले ही ब्याज जोड़ दिया जाता है, जबकि कुछ मामलों में बैंक ब्याज के बराबर छूट देते हैं, लेकिन उस पर लगने वाला जीएसटी ग्राहक को ही देना पड़ता है। इस तरह यह ऑफर पूरी तरह मुफ्त नहीं रह जाता। इसके अलावा, ईएमआई में बदलते समय बैंक एक बार की प्रोसेसिंग फीस भी वसूलते हैं, जो 99 रुपये से लेकर 500 रुपये या उससे अधिक हो सकती है। यदि ग्राहक तय अवधि से पहले पूरा भुगतान करना चाहता है, तो उस पर 2 से 3 प्रतिशत तक फोरक्लोजर शुल्क भी लगाया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी शुल्कों पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी लगाया जाता है, जिससे कुल खर्च और बढ़ जाता है। यही कारण है कि ‘नो-कॉस्ट ईएमआई’ के बावजूद ग्राहक को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, त्योहारों और सेल के दौरान क्रेडिट कार्ड से होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है और कई बार यह 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच जाता है। ऐसे में बढ़ते खर्च के साथ कर्ज के जाल में फंसने का खतरा भी बढ़ रहा है।
जानकारों का सुझाव है कि खरीदारी से पहले उपभोक्ताओं को कुल लागत का सही आकलन करना चाहिए, ईएमआई के नियम और शर्तों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और संभव हो तो सीधे भुगतान विकल्पों की भी तुलना करनी चाहिए। समझदारी से लिया गया निर्णय ही अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचा सकता है।

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