कश्मीर घूमने जा रहे हैं तो हो जाइए सावधान! फायर सेफ्टी के बिना चल रहे होटल, दांव पर पर्यटकों की जान
जम्मू-कश्मीर, खासकर श्रीनगर के कई होटलों में अग्नि सुरक्षा मानकों की कमी से पर्यटकों की जान जोखिम में है।

श्रीनगर/एजेंसी। पर्यटन उद्योग जम्मू-कश्मीर प्रदेश विशेषकर घाटी की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी माना जाता है। इस अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में यहां के व्यावायासिक ढांचे विशेषकर होटल व रेस्तरां प्रमूख भूमिका निभाते हैं। पर्यटकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिकांश पर्यटन स्थलों के आसपास होटलों व रेस्तरां की भरमार है। श्रीनगर समेत घाटी के अधिकांश जिलों में भी सैकड़ों होटल व रेस्तरां पर्यटकों की मेहमान नवाजी के लिए उललब्ध रहते हैं होटल व्यवसाय से जुड़े लोग नए नए खूबसूरत डिजाइनों के होटलों का निर्माण कर पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करने की होड़ में रहते हैं और पर्यटकों को होटल में हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराने का आश्वासन भी मिलता है।
हालांकि इन होटलों में पर्यटकों को आवश्यक सुविधाएं तो बेशक मिलती हैं अलबत्ता इनमें ठहरने वाले पर्यटकों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। अग्निशमन विभाग के एक अधिकारी तौसीफ अहमद (स्टाफ ऑफिसर टु डायरेक्टर) ने कहा कि कुछ बड़े होटलों को छोड़ घाटी विशेषकर श्रीनगर के अधिकांश होटलों में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए कोई व्यापक प्रबंध या प्रणाली नही है।
अधिकारी ने कहा कि आग से बचावे के लिए सब से पहला मानक फायर गेप (एक रिहायशी या व्यावासायी ढांचे से दूसरे रिहायशी या व्यावासायी ढांचे के बीच दूरी) होती है। उन्होंने कहा कि लेकिन इस मानक पर यहां ज्यादा ध्यान नही दिया जाता है और रिहायशी या व्यावासीय ढांचे बिलकुल एक दूसरे के साथ सटे रहते हैं।अधिकारी ने कहा कि यही कारण है कि श्रीनगर के भीड़भाड़ वाले इलाकों विशेषकर डाउनटाउन में आग से ज्यादा नुकसान हो जाता है। अधिकारी ने बताया कि यह होटल व व्यावासायिक ढांचे उक्त इलाकों की तंग व संकरी गलियों में मौजूद होते हैं जहां आग लगने की सूरत में दमकल कर्मियों को आग बुझाने तथा बचाव कार्रवाई करने में दिकक्तों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि श्रीनगर में स्थित तकरीबन 900 होटलों को हमारे विभाग की तरफ से एनओसी मिली हुई है। क्योंकि वह आग से बचाव के मापदंड़ों का पालन करते हैं। उन्होंने कहा, हम हर साल घाटी के 3-4 हजार होटलों व रेस्तरां को एनओसी देते हैं और यह बात सुनिश्चित करते हैं कि इन होटलों में आग से बचाव का व्यापक प्रबंध हो। जरूरत इस बात की है कि आज मालवीय नगर, दिल्ली की घटना से सीख लेते हुए इन होटलों का नए सिरे से निरीक्षण कर यह बात सुनिश्चित की जानी चाहिए कि क्या इन होटलों में आग से बचाव के नियमों का पालन किया जाता है और क्या इन होटलों या व्यावासायिक ढांचों में आग से बचाव के लिए व्यापक प्रबंध है या नही। उन्होंने कहा,इस मुद्दे को गंभीरता से न लेने तक इन होटलों व व्यावालायिक ढांचों में आग से होने वाले नान व माल के नुकसान की कोई गारेंटी नही है।
कश्मीर में 3600 होटल
बता देंकि घाटी में तकरीबन 3600 होटल व गेस्टहाउस हैं, जिनमें से तकरीबन 2000 होटल व गेस्ट हाउस ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में सिथत हैं। इनमें से अधिकांश होटल श्रीनगर में सिथत प्रसिद्ध डल झील किनारे तथा पुराने शहर (डाउनटाउन) व लालचौक में स्थित हैं।सिविल लाइंज व अपटाउन इलाकों जिनमें सोनवार,गुपकार, बटमालू, हैदरपोरा,नटीपोरा आदि जैसे इलाकों में भी कुछ होटल स्थित हैं। लेकिन डल झील,लालचौक व भीड़भाड़ वाले डाउनटाउन के इलाकों जहां अधिकांश पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है, में होटलों की भरमार है। डाउनटाउन के भीड़भाड़ वाले इलाकों की तंग व संकरी गलियों में सिथत होटल बिलकुल एक दूसरे के साथ इस तरह सटे हुए हैं कि अधिकांश होटलों पर सूरज की रोशनी भी ठीक तरह से नही पड़ती। अलबत्ता इसके बावजूद भी इन होटलों में पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता हैं और पीक सीजन में इन होटलों में तिल धरने की भी जगह नही मिलती।




