ईरान के लिए दिया 20 लाख डॉलर का दान, जम्मू- कश्मीर के ‘मिनी ईरान’ के मुसलमानों ने खोल दिया खजाना

जम्मू-कश्मीर में ईरान के लिए खूब चंदा जुटाया गया। लगभग दो मिलियन डॉलर जमा हुए। यह रकम ईरान की मदद को भेजी गई। भारत से ईरान के लिए जो चंदा जुटा, उसमें सबसे ज्यादा जम्मू-कश्मीर से ही एकत्र हुआ। श्रीनगर, बडमाग जैसे इलाकों में लोगों के पास जो था, वह मदद के लिए दिया।
श्रीनगर/एजेंसी। श्रीनगर में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या के बाद शिया समुदाय ने बड़े पैमाने पर फंडरेज़िंग अभियान चलाया। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, मार्च के अंत में बडगाम और श्रीनगर में हुए कलेक्शन ड्राइव से लगभग 18 करोड़ रुपये (करीब 2 मिलियन डॉलर) जुटाए गए, जो सीधे नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास को भेजे गए। इस दौरान खामेनेई के चित्रों के साथ चंदा इकट्ठा करने के कार्यक्रम आयोजित हुए, जिनमें लोगों ने नकद, गहने और घरेलू सामान तक दान किया।
28 फरवरी को खामेनेई की मौत के बाद कश्मीर में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे। श्रीनगर में कुछ जगहों पर हिंसक झड़पें हुईं, जिसमें 12 लोग घायल हुए। पुलिस ने आंसू गैस और लाठीचार्ज किया, इंटरनेट सेवा पांच दिन तक बंद रही और 50 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। प्रदर्शनकारियों ने बदले की मांग भी की।
विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में ईरानी प्रभाव सबसे गहरा है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जस्टिन जोन्स ने कहा कि यहां शिया समुदाय ईरान के राजनीतिक न्याय और वैचारिक सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा हुआ है। वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता जावेद बेग ने बताया कि अली खामेनेई को अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ मज़बूती से खड़े होने वाले नेता के रूप में देखा जाता है।
कश्मीरी युवाओं में भी दो तरह की सोच सामने आई है—एक समूह ईरान को शिया राजनीतिक व्यवस्था का आधार मानता है, जबकि दूसरा इसे एक ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखता है जो भविष्य में फिर से जीवित हो सकती है।
कश्मीर में सक्रिय संस्थाएं जैसे इमाम खुमैनी मेमोरियल ट्रस्ट और अल-मुस्तफ़ा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी स्थानीय धर्मगुरुओं को प्रशिक्षण और धार्मिक शिक्षा के लिए सहयोग देती हैं। हालांकि, सुरक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के जुड़ाव राजनीतिक कट्टरपंथ को बढ़ावा दे सकते हैं। भाजपा से जुड़े विश्लेषक साजिद यूसुफ शाह ने कहा कि यहां शिया समुदाय इस्लामिक रिपब्लिक के प्रति गहरी वैचारिक वफादारी रखता है और पश्चिमीकरण को अस्वीकार करता है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि कश्मीर में ईरान का धार्मिक और वैचारिक प्रभाव कितना गहरा है और इसका असर स्थानीय राजनीति और समाज पर लगातार बना हुआ है।





