राजस्थान का मानगढ़ धाम फिर चर्चा में , भीलों के विद्रोह के बाद जानें कैसा थर्रा गई थी अंग्रेजी हूकूमत

बांसवाड़ा/राजस्थान। बांसवाड़ा में स्थित मानगढ़ धाम एक बार फिर चर्चा में है। आज मानगढ़ की चर्चा देश की संसद में हुई। दरअसल, उदयपुर से बीजेपी सांसद मन्नालाल रावत ने लोकसभा में इसे लेकर 23 मार्च को सवाल किया था। रावत की ओर से मानगढ़ को लेकर यह सवाल किया था कि वर्तमान में मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन है, या नहीं, इसके जवाब देते हुए केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इसके प्रस्ताव को लेकर इनकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से सदन में यह जानकारी दे दी है कि मानगढ़ को अभी राष्ट्रीय स्मारक बनाने घोषित करने का अभी कोई प्रस्ताव नहीं है। ना ही इस पर कोई फिल्म और बेव सीरीज बनाने की योजना है।
दरअसल मानगढ़ धाम राजस्थान के साथ गुजरात और मध्य प्रदेश के आदिवासियों के लिए भी आस्था का बड़ा केंद्र है। ये 110 साल पहले आदिवासियों की ओर से दी गई उस शहादत को याद दिलाता है, जो आज भी लोगों को भावुक करने का साथ ही शौर्य और बलिदान की कहानी बताती है। यहां हुए भयावह नरसंहार की वजह से इसे ‘आदिवासियों का जलियांवाला बाग’ या ‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ भी कहा जाता है। यह स्थल भील आदिवासियों के अदम्य साहस और उनके आध्यात्मिक गुरु, गोविंद गुरु के संघर्ष की अमर गाथा है।
17 नवंबर 1913: शौर्य और शहादत का वो काला दिन
इतिहास की यह तारीख भील आदिवासियों के बलिदान को बयां करती है। 1913 में गोविंद गुरु के नेतृत्व में हजारों आदिवासी मानगढ़ की पहाड़ी पर एकत्रित हुए थे। उनका उद्देश्य केवल ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करना ही नहीं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों को त्यागना और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ आवाज उठाना था। लेकिन भीलों के इस विद्रोह से अंग्रेजी हूकूमत ऐसी घबराई कि उन्होंने नृशंस नरसंहार का ले लिया। हम बात कर रहे हैं उस वक्त की जब 1913 में जब ब्रिटिश सेना ने कर्नल शटर के नेतृत्व में इस पहाड़ी को चारों ओर से घेरकर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं, तो करीब 1500 भील आदिवासी शहीद हो गए। यह नरसंहार जलियांवाला बाग से भी अधिक नृशंस माना जाता है, क्योंकि यहां आदिवासियों को न केवल विदेशी हुकूमत, बल्कि स्थानीय रजवाड़ों के जुल्मों का भी सामना करना पड़ रहा था।
गोविंद गुरु: आदिवासियों में अलख जगाने वाले जननायक
स्वतंत्रता सेनानी गोविंद गुरु (गोविंद गिरि) का जन्म 20 दिसंबर 1858 को डूंगरपुर के बांसिया बेड़िया गांव में एक बंजारा परिवार में हुआ था। उन्होंने भील समुदाय में शिक्षा, नैतिकता और देशभक्ति की ज्योति जलाई। मानगढ़ कांड के बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। जेल से मुक्त होने के बाद भी उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा और आदिवासियों के उत्थान में लगा दिया।
राष्ट्रीय धरोहर बनाने की गूंज
राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाओं पर स्थित इस पावन धाम को ‘राष्ट्रीय स्मारक’ घोषित करने की मांग लंबे समय से चल रही है। इसे लेकर पूर्व सीएम अशोक गहलोत भी अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री के समक्ष रख चुके हैं। वहीं प्रधानमंत्री भी इस पावन भूमि पर शीश नवाकर इसके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इसे वर्तमान में राष्ट्रीय स्मारक बनाए जाने का कोई भी विचार विचाराधीन नहीं है।




