‘बैल से बना दी बिजली’, मुख्तार अंसारी पर कार्रवाई करने वाले पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह का नवाचार

शैलेंद्र सिंह का 'फ्लाईव्हील' कॉन्सेप्ट, कराएगा माह में 5000 रुपये आमदनी

लखनऊ ब्यूरो। पुलिस अधिकारी रहे तो बदमाशों और माफिया की कमर तोड़कर अपराध पर लगाम कसी। बाहुबली मुख्तार अंसारी पर कड़ी कार्रवाई कर चर्चित हुए पूर्व डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह अब गोसेवा कर रहे हैं। उन्होंने बिजली बनाने का अनूठा सफल प्रयोग किया है। वह बैलों के माध्यम से नंदी रथ से बिजली बना रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक मारामारी ऊर्जा को लेकर मची हुई है। ईरान, इस्राइल-अमेरिका के बीच जंग के पीछे भी ऊर्जा ही महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है। वहीं, देश में ग्रीन एनर्जी के विकास को लेकर लगातार काम हो रहा है। प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी सोलर एनर्जी को लेकर लगातार काम किया है। इन सबके बीच यूपी के डीएसपी शैलेंद्र सिंह ‘बैल-चालित’ बिजली समाधान विकसित करने में कामयाब रहे हैं। बैल की ताकत से चक्की चलाकर बिजली उत्पादन की नई तकनीक उन्होंने विकसित की है। फ्लाईव्हील तकनीक के जरिए वे एक बैल से हर माह पांच हजार रुपये तक की कमाई का दावा कर रहे हैं।
पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि मैं लखनऊ के सिधपुरा में मई 2017 से ‘श्री ग्राम धाम गौशाला’ चला रहा हूं। वे बताते हैं कि हमने पारंपरिक ज्ञान को नई तकनीक के साथ मिलाकर ‘फ्लाईव्हील’ कॉन्सेप्ट बनाया है। यह गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल करता है। वे कहते हैं कि ऊर्जा के क्षेत्र में हमें यह मॉडल आत्मनिर्भर बना सकता है। वे कहते हैं कि इस मॉडल को 7000 सरकारी गौशालाओं में लागू किया जाना चाहिए। यह आय पैदा करने के साथ-साथ एक प्रशिक्षण केंद्र के तौर पर भी काम कर सकता है।
गोवंश के लिए बनाई तकनीक
शैलेंद्र सिंह कहते हैं कि हमने 2017 में गोवंश की रक्षा को लेकर योजना तैयार की। दरअसल, गोवंश सड़कों पर घूमते रहते हैं। ट्रैफिक सिस्टम को प्रभावित करते हैं। किसानों के खेत में घुसकर फसल खराब करते हैं। पहले बैलों से खेती में काम लिया जाता था। लेकिन, बाद के समय में इसे छोड़ दिया गया। ऐसे में सड़कों निराश्रित घूमने वाले बैल के लिए नई योजना बनाई। इसके लिए हमने वैदिक तरीके में नई टेक्नोलॉजी को मिलाकर काम लेने का निर्णय लिया। फ्लाईव्हील तकनीक इसी का परिणाम है।
पूर्व डीएसपी शैलेंद्र सिंह ने फ्लाईव्हील के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि इसमें एक बड़ा व्हील लगा हुआ है। इससे मैकेनिकल डायनेमो लगा है। व्हील एक कोन पर लगा है। इसमें बैल को खड़ा किया जाता है। उनके आगे चारा रखा होता है। बैल व्हील पर रखे चारा को खाने के लिए आगे बढ़ते हैं तो व्हील भी चलता है। बैल जैसे ही रुकते हैं, पीछे खिसक जाते हैं। इससे चारा दूर होता है। वे फिर उसे खाने के लिए बढ़ते हैं। बैल इस व्हील पर आराम से चलता रहता है। इससे व्हील भी गतिमान रहता है और बिजली बनती रहती है। एक घंटे में 5 यूनिट तक बिजली ये बैल बना देते हैं।
शैलेंद्र सिंह समझाते हैं कि अगर दो-दो घंटे की शिफ्ट में अगर आप एक बैल से 8 घंटे का काम लें तो वे 40 यूनिट बिजली बनाते हैं। इस बिजली को अगर सरकार 7 रुपये प्रति यूनिट की दर से भी खरीदती है तो किसान को 280 रुपये मिल जाएंगे। बैल को इस दौरान 100 रुपये का खाना देना होगा। इस प्रकार किसान को 180 रुपये की बचत आसानी से हो जाएगी। इस प्रकार महीने में वह 5 हजार रुपये तक कमा सकता है।
शैलेंद्र सिंह ने सरकार से अपील की कि प्रदेश के 7000 गो-आश्रय केंद्रों में इस प्रकार के मॉडल को अपनाया जाए। इससे बैल से आय होगी। साथ ही साथ, वह ट्रेनिंग सेंटर भी बन जाएंगे। लोग वहां जाकर देखेंगे। इस प्रकार के फ्लाईव्हील मॉडल का प्रोडक्ट भी बेहतर है। वोल्टेज भी 200 वॉट तक होता है। इसके अलावा बैल के गोबर को गोबर गैस के प्लांट में रखकर गैस निकालने में उपयोग में लाया सकेगा। वैकल्पिक ऊर्जा और कार्बन रहित ऊर्जा के स्रोत के तौर पर हम इसका उपयोग कर सकते हैं। बैलों की समस्या का भी समाधान होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button