भाई-बहन के पावन संबंधों की मजबूती का पर्व है भैया दूज : महंत शिव सागर भारती

भाई-बहन के दिलों में पावन संबंधों की मजबूती और प्रेमभाव स्थापित करने वाला पर्व है ‘भैया दूज’। इस दिन बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर ईश्वर से उनकी दीर्घायु की कामना करती हैं। कहा जाता है कि इससे भाई यमराज के प्रकोप से बचे रहते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाईदूज का पर्व मनाया जाता है। भाईदूज को भैया दूज, भाई टीका, यम द्वितीया, भ्रातृ द्वितीया आदि नामों से भी जाना जाता है। भैया दूज का पर्व देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के माथे पर रोली और अक्षत से तिलक कर उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए कामना करती हैं। इस दिन बहनें अपने भाईओं को अपने घर भोजन के लिए बुलाती हैं। माना जाता है कि इससे भाई की उम्र बढ़ती है। इसके साथ ही भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देते हैं। भाईदूज के दिन यमराज का पूजन किया जाता है और इस दिन यमुना में डुबकी लगाने का विशेष महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार मान्यता है कि इस दिन यम देव अपनी बहन यमुना के कहने पर घर पर भोजन करने गए थे।

भगवान सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज और यमुना का जन्म हुआ था। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थी और अक्सर उनसे अनुरोध करती रहती थी कि वे अपने इष्ट मित्रों सहित उसके घर भोजन के लिए पधारें लेकिन यमराज हर बार उसके निमंत्रण को किसी न किसी बहाने से टाल जाते। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने यमराज को एक बार फिर भोजन के लिए आमंत्रित किया। उस समय यमराज ने विचार किया कि मैं तो अपने कर्त्तव्य से बंधा सदैव प्राणियों के प्राण ही हरता हूं, इसलिए इस चराचर जगत में कोई भी मुझे अपने घर नहीं बुलाना चाहता लेकिन बहन यमुना तो मुझे बार-बार अपने घर आमंत्रित कर रही है, इसलिए अब तो उसका निमंत्रण स्वीकार करना ही चाहिए।

यमराज को अपने घर आया देख यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने भाई का खूब आदर-सत्कार करते हुए उनके समक्ष नाना प्रकार के व्यंजन परोसे। बहन के आतिथ्य से यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे कोई वर मांगने को कहा। इस पर यमुना ने उनसे अनुरोध किया कि आप प्रतिवर्ष इसी दिन मेरे घर आकर भोजन करें और मेरी तरह जो भी बहन इस दिन अपने भाई का आदर-सत्कार करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने बहन यमुना को उसका इच्छित वरदान दे दिया। ऐसी मान्यता है कि उसी दिन से ‘भैया दूज’ का पर्व मनाया जाने लगा।ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता।

इस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और भगवान की पूजा करें। अब भाई का तिलक करने के लिए थाल सजा लें। पूजा की थाली में कुमकुम, सिंदूर, चंदन, फल, फूल, मिठाई, अक्षत और सुपारी आदि रख लें। भाई को तिलक करने से पहले पिसे हुए चावल के आटे या घोल से चौक बनाएं और शुभ मुहूर्त में इस चौक पर भाई को बिठाएं। इसके बाद भाई को तिलक लगाएं। भाई को तिलक करने के बाद फूल, पान, सुपारी, बताशे और काले चने भाई को दें और उनकी आरती उतारें। तिलक और आरती करने के बाद भाई को मिठाई खिलाएं और अपने हाथों से बना भोजना कराएं। ज्योतिषों के अनुसार भाई दूज का पर्व मनाने का शुभ मुहूर्त 26 अक्टूबर बुधवार दोपहर 2:34 बजे से शुरू होकर 27 अक्टूबर गुरुवार दोपहर 1:18 बजे से 3:30 बजे तक चलेगा।

सौजन्य से : महंत शिव सागर भारती,
(रजादेपुर मठ,आजमगढ़,उत्तर प्रदेश)

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