छोटी सी उम्र में बच्चो ने रखा पहला रोजा
फतेहपुर जिले के खखरेरू क्षेत्र के पौली निवासी लाला मिर्जा पुत्र अली मिर्जा ने आठ साल की उम्र में रखा पहला रोजा

फतेहपुर/उत्तर प्रदेश। मुस्लिम समाज के लिए माहे रमज़ान बरकत और इबादतो का महीना होता है ऐसे में हर मोमिन पर रोजा फर्ज होता है इस्लाम के हिसाब से 13 साल का होने पर रोजा रखना फर्ज हो जाता है लेकिन शरियत कहती हैं सात आठ साल के बच्चो को रोजा रखने का शौक पैदा करो और रोजे रखने के बहुत सारे फजाइल है। मुस्लिम समाज के लिए माहे रमज़ान बरकत और इबादतो का महीना होता है ऐसे में हर मोमिन पर रोजा फर्ज होता है इस्लाम के हिसाब से 13 साल का होने पर रोजा रखना फर्ज हो जाता है लेकिन शरियत कहती हैं सात आठ साल के बच्चो को रोजा रखने का शौक पैदा करो और रोजे रखने के बहुत सारे फजाइल है उनमें से एक फजीलत ये है सरकारें दोआलम सल्लाहो अलैह वशल्लम ने इरशाद फ़रमाया जब कोई रोजदार रोजा रखता है तो जो मुंह से जो बू वा हवा आती है जन्नत की खुशबू से बढ़कर होती है और हर चीज में दिखावा हो जाता है की हमने चंदे के लिए दस रुपए दिए या कोई चीज दान किए और लोग नमाजी नमाज पढ़ते है तो उसमे भी दो चार लोग कहते है अरे ये तो नमाजी हो गया लेकिन रोजा एक ऐसी चीज है जिसकी जजा जिसका सिला अल्लाह रब्बुल इज्जत मैदाने मैहशर में देगा और कहेगा जो रोजदार है मैं उनको अपने हाथों से ईनाम किराम दूंगा।
इसीलिए माहे रमज़ान के महीने में सभी मुस्लिम समाज के लोग रोजा रखना वा इबादत करने में मशगूल हो जाते है ये महीना बड़ी ही बरकतो का होता है अगर देखा जाए तो माहे रमजान के पवित्र महीने में सबसे ज्यादा रोजा रखना वा इबादत करने में कठनाइयां महिलाओं को होती है क्योंकि रोजा नमाज करने के साथ साथ सहरी टाइम उठना रोजदारो के लिए खाना बनाना खिलाना दिन में घर का सारा काम करना नमाज पढ़ना इबादत करना उसके बाद रोजा इफ्तार से दो तीन घंटे पहले फिर से रोजा खोलने का सामान तैयार करना पड़ता है फिर भी महिलाए हसीं खुशी के साथ रोजा वा इबादत करती रहती हैं। उनमें से एक फजीलत ये है सरकारें दोआलम सल्लाहो अलैह वशल्लम ने इरशाद फ़रमाया जब कोई रोजदार रोजा रखता है तो जो मुंह से जो बू वा हवा आती है जन्नत की खुशबू से बढ़कर होती है और हर चीज में दिखावा हो जाता है की हमने चंदे के लिए दस रुपए दिए या कोई चीज दान किए और लोग नमाजी नमाज पढ़ते है तो उसमे भी दो चार लोग कहते है अरे ये तो नमाजी हो गया लेकिन रोजा एक ऐसी चीज है जिसकी जजा जिसका सिला अल्लाह रब्बुल इज्जत मैदाने मैहशर में देगा और कहेगा जो रोजदार है मैं उनको अपने हाथों से ईनाम किराम दूंगा।
इसीलिए माहे रमज़ान के महीने में सभी मुस्लिम समाज के लोग रोजा रखना वा इबादत करने में मशगूल हो जाते है ये महीना बड़ी ही बरकतो का होता है अगर देखा जाए तो माहे रमजान के पवित्र महीने में सबसे ज्यादा रोजा रखना वा इबादत करने में कठनाइयां महिलाओं को होती है क्योंकि रोजा नमाज करने के साथ साथ सहरी टाइम उठना रोजदारो के लिए खाना बनाना खिलाना दिन में घर का सारा काम करना नमाज पढ़ना इबादत करना उसके बाद रोजा इफ्तार से दो तीन घंटे पहले फिर से रोजा खोलने का सामान तैयार करना पड़ता है फिर भी महिलाए हसीं खुशी के साथ रोजा वा इबादत करती रहती हैं।




