डीयू के कॉलेज ने गर्मी से बचने के लिए अपनाया अनोखा तरीका, प्रिंसिपल ने क्लास की दीवार को गोबर से पोता

DU college adopted a unique way to escape the heat, the principal plastered the class wall with cow dung

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कॉलेज में कक्षाओं को ठंडा करने के लिए हैरान करने वाला तरीका अपनाया गया है। कॉलेज की प्राचार्य ने एक कक्ष को गोबर से पोत दिया। वह खुद ऐसा कर रही हैं। उनके साथ कुछ कर्मचारी भी लगे हुए हैं। उन्होंने शिक्षकों के ग्रुप में वीडियो साझा कर खुद इसकी जानकारी दी है। इसका वीडियो तेजी से इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हो रहा है। कई प्रोफेसरों और छात्रों ने इस पर हैरानी जताई है।
लक्ष्मीबाई कॉलेज की प्राचार्य प्रो. प्रत्युष वत्सला ने कॉलेज शिक्षकों के ग्रुप में वीडियो साझा करते हुए लिखा है कि सी ब्लाक में गर्मी की शिकायत के लिए देसी उपाय किए जा रहे हैं। यहां जिनकी कक्षाएं हैं, उन्हें शीघ्र ही ये कमरे एक नए कलेवर में मिलेंगे। आपका शिक्षण अनुभव सुखद हो, इसका प्रयास चल रहा है। लक्ष्मीबाई कॉलेज में पांच ब्लाक हैं। इनमें सी ब्लाक की इमारत पुरानी है। इसके नीचे कैंटीन चलती है और ऊपर कक्षाएं लगती हैं।
एक शिक्षिका ने कहा, यहां थोड़ी गर्मी लगती है। लेकिन, इसके लिए कक्षाओं में कूलर लगाए जाने चाहिए। कॉलेज के कक्ष बड़े-बड़े हैं और कई कक्षों में पर्याप्त पंखे नहीं लगे हैं। गर्मी के मौसम में छात्राओं को सर्वाधिक परेशानी होती है। किसी भी कक्ष में एयर कंडीशनर नहीं लगा है। कूलर भी नहीं हैं। पंखे से ही छात्राओं को काम चलाना पड़ता है। उनकी संख्या भी कम है। नए इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित नहीं किया गया है। कॉलेज के वाशरूम भी साफ नहीं होते।
हाल में कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने एक नए ब्लॉक के लिए शिलान्यास कार्यक्रम किया था। पुरानी इमारत को अभी तक दुरुस्त नहीं कराया गया है। अब प्राचार्य उस पर गोबर लगाकर गर्मी के उपाए बता रही हैं। कॉलेज की एक छात्रा ने कहा, कुछ कक्षों में गर्मी रहती है। कुछ ब्लॉक में गर्मी नहीं रहती। किसी भी छात्रा ने गोबर लगाने की मांग उनसे नहीं की थी।
इंडियन नेशनल टीचर कांग्रेस (इंटेक) के अध्यक्ष प्रो. पंकज गर्ग ने कहा कि कॉलेज में बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने की बजाए, कक्षों को गोबर से पोता जा रहा है। हम छात्रों को क्या संदेश देना चाहते हैं। वैसे भी कंक्रीट की दीवार पर गोबर लगाने का क्या औचित्य है। इस बारे में जब कॉलेज की प्राचार्य प्रो. प्रत्युष वत्सला से पूछा गया कि उन्हें यह विचार कहां से आया, तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। जब पूछा गया कि उनके कॉलेज में पंखे व कूलर नहीं है, तो उन्होंने कहा कि शायद नहीं होंगे। इसके बाद फोन काट दिया।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर पीके जोशी ने कहा कि क्रंकीट की दीवारों पर गोबर या मिट्टी के लेप लगाने से बहुत अधिक फायदा नहीं होता। अगर कोई नया निर्माण किया जा रहा है तो फिर गोबर या मिट्टी का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पर्यावरण के लिए फायदेमंद होता है।
गर्मी के मौसम में फायदा करता है। लेकिन, शहरी इलाकों में ऐसे निर्माण अब देखने को नहीं मिलते। फिर यह अधिक टिकाऊ नहीं होते, अधिक वर्षा व आंधी में इनके ढहने की संभावना रहती है। पहले पत्थरों से निर्माण होते थे और उनमें भी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता था। वह गर्मियों में राहत देते थे। लेकिन, अब सीमेंट और रेत के मैटेरियल से ही इमारतें बनाई जा रही हैं। इन पर ऐसे प्रयोग असरदार नहीं हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button