रेप पीड़िता को घुमाती रही जाफराबाद थाने की पुलिस, कोर्ट के निशाने पर पुलिस, उठाए कई सवाल
डीसीपी की जानकारी में मामला लाए जाने के बाद भी एफआरआई दर्ज करने में तीन दिन की देरी

- रेप मामले में शिकायत फरवरी में दी गई, फिर भी एफआईआर नहीं
- दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर अदालत ने उठाया बड़ा सवाल
- कड़कड़डूमा कोर्ट ने पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी किया
- एफआईआर दर्ज न करने पर पुलिस की लापरवाही पर चिंता
उत्तर पूर्वी दिल्ली। अदालत ने रेप जैसे गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज न करने पर दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। कड़कड़डूमा कोर्ट की फास्ट ट्रैक अदालत ने इस मामले में जब पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी किया तब कहीं जाकर जाफराबाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि डीसीपी जैसे सीनियर अधिकारी की जानकारी में मामला लाए जाने के बाद भी एफआरआई दर्ज करने में तीन दिन की देरी की गई। अदालत ने मामले से जुड़ी ऑर्डर की कॉपी दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजने का आदेश दिया है।रेप केस में आरोपी बनाए गए कुनाल भाटी ने अपने वकीलों के माध्यम से कड़कड़डूमा कोर्ट की फास्ट ट्रैक अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की थी। आरोपी के वकीलों द्वारा अर्जी वापस लेने के बाद अदालत ने इसे खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान इस बात का खुलासा हुआ कि पीड़िता ने फरवरी में जाफराबाद थाने में शिकायत रेप की शिकायत दी थी। पुलिस ने महिला की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की। अदालत ने रेप जैसे गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज न करने पर पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
नोटिस पर सुनवाई के दौरान पुलिस ने माना कि शिकायतकर्ता द्वारा फरवरी में थाना जाफराबाद में रेप की लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने यह भी माना कि संबंधित शिकायत में स्वयं ही एक संज्ञेय अपराध का स्पष्ट उल्लेख था। प्रारंभिक जांच के नाम पर एफआईआर दर्ज नहीं की गई, ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि आरोप सत्य हैं या नहीं।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि रेप जैसे गंभीर अपराध में किसी भी प्रकार की जांच या प्रारंभिक जांच के नाम पर एफआईआर दर्ज करने में देरी नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि भले ही पुलिस को यह लगे कि आरोपों में कोई सचाई नहीं है, लेकिन वह एफआईआर दर्ज करने के बाद ही वह ऐसा कह सकती है। इससे अधिक चिंताजनक कुछ नहीं हो सकता कि 18 मार्च को संबंधित डीसीपी के संज्ञान में लाए जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज करने में कम से कम तीन और दिनों की देरी की गई। यह जांच एजेंसी के बेहद लापरवाह रवैये को दर्शाता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को इस स्तर पर लाने के बावजूद पालन नहीं किया गया। अदालत ने ऑर्डर की कॉपी पुलिस कमिश्नर को भेजने का आदेश दिया है, जिससे भविष्य में इस प्रकार से कानून का उल्लंघन न हों और ट्रांस यमुना क्षेत्र के थानों में कार्यशैली पीड़ितों की अपेक्षाओं के अनुरूप बेहतर की जाए।



