फर्जी एनकाउंटर मामले में 32 साल बाद इंसाफ, पंजाब पुलिस का पूर्व एसएचओ और कांस्टेबल दोषी करार
Justice after 32 years in fake encounter case, former SHO and constable of Punjab Police found guilty

चंडीगढ़/एजेंसी। पंजाब पुलिस के दो पूर्व कर्मचारियों को मोहाली की एक सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराया है। ये पुलिसकर्मी 32 साल पहले तरनतारन में एक फर्ज़ी मुठभेड़ में दो युवकों की हत्या के दोषी पाए गए हैं। दोनों की सजा का ऐलान 6 मार्च को होगा। सीबीआई के विशेष जज राकेश गुप्ता ने पट्टी पुलिस स्टेशन के तत्कालीन एसएचओ सीता राम (80 वर्ष) को आईपीसी की धारा 302, 201 और 218 के तहत दोषी पाया है। वहीं कॉन्स्टेबल राजपाल (57 वर्ष) को आईपीसी की धारा 201 और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया गया है। अदालत ने इस मामले मे पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया।
यह मामला 1993 का है। गुरदेव सिंह उर्फ देबा और सुखवंत सिंह नाम के दो युवकों को एक फर्जी एनाकाउंटर में मार दिया गया था। 1995 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, सीबीआई ने इस मामले की जांच अपने हाथ में ली। जांच से पता चला कि 30 जनवरी, 1993 को एएसआई नौरंग सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस दल ने गुरदेव को तरनतारन स्थित उसके घर से उठा लिया था। 5 फरवरी को एएसआई दीदार सिंह के नेतृत्व में एक अन्य पुलिस दल ने सुखवंत को उसी जिले के बहमनिवाला स्थित उसके घर से उठा लिया था।
पुलिस ने दोनों की निर्मम हत्या कर दी थी। बाद में पुलिस ने झूठी कहानी गढ़ी कि 6 फरवरी, 1993 को एक पुलिस मुठभेड़ में दोनों मारे गए। अपराध को छुपाने के लिए एक झूठी एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने झूठा दावा किया कि दोनों युवक हत्या और जबरन वसूली सहित 300 गंभीर अपराधों में शामिल थे। सबीबीआई जांच ने पुलिस के दावों को झूठा साबित कर दिया। साल 2000 में सीबीआई ने एएसआई नौरंग सिंह, दीदार सिंह, तत्कालीन पट्टी डीएसपी कश्मीर सिंह, एसएचओ सीता राम और अन्य सहित 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की। 2001 में उनके खिलाफ आरोप तय किए गए थे।




