रोहिंग्याओं को हथियार दे रहा पाकिस्तान, बांग्लादेश में एक्टिव हुई आईएसआई

कॉक्स बाजार की रैली से टेंशन में भारत

ढाका/एजेंसी। बांग्लादेश में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव के कारण रोहिंग्या के हथियारबंद समूहों की गतिविधियों में इजाफा हुआ है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इसके भारत सहित म्यांमार और बांग्लादेश पर भी दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। 25 दिसंबर को म्यांमार के चार विद्रोही संगठन अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए), रोहिंग्या सॉलिडेरिटी ऑर्गनाइजेशन (आरएसओ), इस्लामी महाज, अराकान नेशनल डिफेंस फोर्स (एएनडीएफ) और अराकान रोहिंग्या आर्मी (एआरए) के प्रतिनिधि बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में एक शरणार्थी शिविर में इकट्ठा हुए और एक साथ मंच साझा किया। यह रैली इन समूहों के बीच फोर ब्रदर्स अलायंस या रोहिंग्या आर्मी नामक एक नए गठबंधन के बाद हुई है।
फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, कॉक्स बाजार के कुटुपालोंग में इस कार्यक्रम को देखने के लिए हजारों शरणार्थी एकत्र हुए थे। कॉक्स बाजार के सूत्रों ने खुलासा किया कि पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) इन विद्रोही संगठनों के साथ मिलकर म्यांमार में अपनी मातृभूमि को फिर से प्राप्त करने के अभियान में सहायता कर रही है। इनमें हथियारों के अलावा ट्रेनिंग देना और इंटेलिजेंट इनपुट देकर इनकी मदद करना भी शामिल है। आईएसआई की सहायता बांग्लादेश सरकार के अधिकारी कर रहे हैं, जिन्हें मोहम्मद यूनुस के अंतरिम सरकार से स्वीकृति मिली हुई है।
अगस्त में अवामी लीग के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में पाकिस्तान की मौजूदगी में जबरदस्त इजाफा हुआ है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत अगले महीने से पाकिस्तानी सेना को अपने बांग्लादेशी समकक्षों को प्रशिक्षित करने की अनुमति भी मिल जाएगी। पाकिस्तानी आईएसआई और सेना के शीर्ष अधिकारी लगातार बांग्लादेश का दौरा कर रहे हैं और भारत के खिलाफ माहौल बनाने में यूनुस सरकार की मदद भी कर रहे हैं। इसमें म्यांमार के रोहिंग्याओं का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करना भी शामिल है।
रोहिंग्याओं के संयुक्त मोर्चे का घोषित उद्देश्य म्यांमार में उस क्षेत्र को फिर से प्राप्त करना है, जहां उन्हें कई वर्ष पहले बेदखल कर भगा दिया गया था। दो महीने पहले भी हजारों की संख्या में रोहिंग्याओं को फिर से अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था, जब म्यांमार के एक जातीय सशस्त्र समूह अराकान आर्मी ने बांग्लादेश की सीमा से लगे मौंगडॉ के सीमावर्ती क्षेत्रों पर कब्जे के लिए सेना के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया था। यह जिला अब पूरी तरह से अराकान आर्मी के नियंत्रण में है।
म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय की संख्या वर्तमान में लगभग दस लाख है, जो राखीन राज्य के विभिन्न कस्बों और दक्षिणी चिन राज्य के पलेटवा में कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। वे स्थानीय आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा हैं, और उनमें से अधिकांश केवल मौंगडॉ में हैं। रोहिंग्या संगठन ज़्यादातर मौंगडॉ में सक्रिय हैं और राखीन राज्य के अन्य हिस्सों में उनका कोई समर्थन आधार नहीं है।
रोहिंग्या सशस्त्र समूहों को हथियारों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। अराकान सेना द्वारा मौंगडॉ पर कब्ज़ा करने से महीनों पहले, सेना ने तीन स्थानीय विद्रोही समूहों- एआरएसए, आरएसओ और एआरए को अराकान सेना का विरोध करने में सहयोग करने के लिए राजी कर लिया था। सेना ने सैकड़ों रोहिंग्या युवाओं को जबरन भर्ती किया था और संगठनों को पिस्तौल और जी-3 राइफलें प्रदान की थीं, लेकिन वे अराकान सेना के अत्याधुनिक हथियारों के सामने कुछ नहीं कर पाए।
शरणार्थी शिविरों में हाल ही में हुए घटनाक्रमों से अवगत कॉक्स बाजार के एक सूत्र ने दावा किया कि रोहिंग्या समूहों को म्यांमार में उनके अभियान के लिए हथियार और विस्फोटक दिए जाने का आश्वासन दिया गया है। सूत्र ने कहा, “परियोजना के मास्टरमाइंड द्वारा रखी गई एक पूर्व शर्त यह थी कि सभी समूहों को एक साझा मंच पर एक साथ लड़ना होगा। यह एक ऐसा प्रस्ताव था जिसे वे अस्वीकार नहीं कर सकते थे।” सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट में आरोप लगाया गया कि शरणार्थी शिविरों के अंदर एआरएसए को हथियार और विस्फोटक भी सौंपे गए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button