महाकुंभ में आए निरंजनी पंचायती अखाड़ा में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील जैसे संन्यासी

Doctors, engineers, lawyers like ascetics came to Niranjani Panchayati Akhara in Maha Kumbh

  • वर्ष 860 में हुआ था निरंजनी अखाड़े का गठन
  • हरिद्वार के मायापुर में है निरंजनी अखाड़े का मुख्यालय
  • कुंभ में चुनाव के जरिए अखाड़े के चुने जाते अधिकारी

प्रयागराज/उत्तर प्रदेश। प्रयागराज में महाकुंभ मेला के आयोजन की तैयारियां चरम पर है। बड़ी संख्या में साधु-संतों का आगमन शुरू हो गया है। ज्ञान, भक्ति और त्याग को आत्मसात करने वाला निरंजनी पंचायती अखाड़ा ऐसा पहला अखाड़ा है, जिसके आधे से ज्यादा संन्यासी डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफेसर समेत उच्च शिक्षा की डिग्री रखते हैं। जूना अखाड़े के बाद सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले इस अखाड़े की स्थापना वर्ष 860 में हुई थी। इसका पूरा नाम श्री पंचायति तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा है। इसका मुख्यालय मायापुर, हरिद्वार में है।निरंजनी अखाड़ा साधुओं की संख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े और प्रमुख अखाड़ों में से एक है। अखाड़े के कई सुशिक्षित संतों में वृंदावन आश्रम में रहने वाले आदित्यानंद गिरि एमबीबीएस डिग्री धारक हैं। अखाड़े के सचिव ओमकार गिरि इंजीनियर हैं। उनके पास एमटेक की डिग्री है। उनके साथ महंत राम रतन गिरि दिल्ली विकास प्राधिकरण में सहायक अभियंता थे। राजेश पुरी ने पीएचडी की डिग्री हासिल की है, जबकि महंत रामानंद पुरी वकील हैं।
निरंजनी अखाड़े के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने कहा कि हमारा अखाड़ा ऐसा है, जिसमें कई साधु हैं। वे योग्य हैं और उच्च शिक्षा की डिग्री रखते हैं। अखाड़े में योग्यता के आधार पर संन्यास की दीक्षा दी जाती है। इसमें संस्कृत के विद्वान और आचार्य भी हैं। सचिव ओमकार गिरि का कहना है कि निरंजनी अखाड़े की स्थापना गुजरात के मांडवी जिले में हुई थी।
ओमकार गिरि ने कहा कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़े का गठन किया गया था। इसके बाद वेद विद्या स्कूल और कॉलेज स्थापित किए गए। निरंजनी अखाड़े में पंच परमेश्वर का महंत सर्वोच्च होता है। सभी निर्णय उसकी स्वीकृति से लिए जाते हैं। इनके अलावा आठ श्री महंत और आठ उप श्री महंत होते हैं। चार सचिव भी होते हैं, जो पंच परमेश्वर के निर्णयों को लागू करते हैं।
अखाड़े संचालन में लगने वाले पदाधिकारियों का चयन चुनाव के जरिए कराया जा रहा है। सभी पदों के लिए हर छह साल में कुंभ और हर 12 साल में महाकुंभ में चुनाव होते हैं। इसके बाद चुने हुए संतों को जिम्मेदारी सौंपी जाती है। निरंजनी अखाड़े में शामिल होने के नियम पहले काफी सख्त हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ इसमें कुछ छूट दी गई है।
आचार्य महामंडलेश्वर कैलाशानंद कहते हैं कि इस अखाड़े में अपराधी और माफिया पैठ नहीं बना सकते। संन्यासी का चयन योग्यता और साक्षात्कार के आधार पर होता है। अखाड़े में शामिल होने से पहले पांच साल तक ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी होता है। इसके बाद महापुरुष की उपाधि दी जाती है। आचार्य कैलाशानंद ने कहा कि महापुरुष अपने गुरु की सेवा करता है। वह गुरु के बर्तन और कपड़े साफ करता है। भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी महापुरुष की होती है। गुरु की सेवा के योग्य साबित होने वाले को ही नागा की दीक्षा दी जाती है।

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