किसी भी स्थिति या परिस्थिति में ट्रस्ट या संस्था को छापा मारने का नहीं है अधिकार

कई बार लोग समाज मे जिनको जरूरत है उनकी भलाई के लिये कुछ दान देना चाहते है और उसके लिये माध्यम की तलाश करते है। कुछ लोग सेवा भावी होते है जो इस कार्य मे आगे आते है ओर ट्रस्ट बना कर इस उद्द्देश्य की पूर्ति करते है।ट्रस्ट को ट्रस्ट अधिनियम, 1882 की धारा 3 में परिभाषित किया गया है, “संपत्ति के स्वामित्व के लिए बाध्य और मालिक द्वारा स्वीकार किए गए और उसके द्वारा स्वीकार किए गए और उसके द्वारा घोषित या स्वीकार किए गए एक विश्वास से उत्पन्न होने वाला दायित्व, दूसरे या किसी अन्य के लाभ के लिए। एक और मालिक।एक ट्रस्ट एजेंसी का एक अनुबंध नहीं है संपत्ति रखने के लिए इसमें मालिक से ट्रस्टी के अधीन कुछ नियमों और शर्तों के लिए स्थानांतरण होता है। एक ट्रस्ट अनिवार्य रूप से किसी व्यक्ति के लाभ के लिए या किसी वस्तु को ले जाने के लिए एक के बाद दूसरे द्वारा संपत्ति का हस्तांतरण होता है। एक ट्रस्ट का उद्देश्य वैध होना चाहिए, अर्थात धोखाधड़ी नहीं होनी चाहिए।
सबसे बड़ा गंभीर मुद्दा यह है की वर्तमान समय में कई ट्रस्ट एवं संस्थाओं के नाम सरकारी एजेंसियों से मिलते जुलते रखे गए हैं और जिन्हें बाकायदा ट्रस्ट या सोसायटी एक्ट में रजिस्टर्ड भी करा दिया गया है। कुछ ट्रस्ट एवं संस्थाएं तो अपना काम ईमानदारी एवं समाज सेवा के लिए कर रही हैं मगर कुछ संस्थाएं ऐसी भी हैं जो सरकारी एजेंसियों से मिलते-जुलते नामों का उपयोग करके आम जनता को प्रताड़ित करने का कार्य कर रहे हैं। ऐसी संस्थाएं सरकारी एजेंसियों के नाम से किसी भी प्रतिष्ठान पर सीधे तौर पर छापामार कार्यवाही कर देती हैं जोकि पूर्णतया गैर कानूनी एवं दंडनीय अपराध है। ऐसा करना ट्रस्ट एक्ट एवं संविधान द्वारा दिए गए निर्देशों का उल्लंघन करना है। अगर कोई ट्रस्ट या संस्था ऐसी किसी भी संलिप्त में पाया जाता है तो उसके ट्रस्टी एवं अध्यक्ष को कम से कम 3 वर्ष का कारावास एवं एक लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। ट्रस्ट द्वारा किए गए अनैतिक कार्यों को देखते हुए सजा एवं जुर्माने को बढ़ाया भी जा सकता है। मतलब साफ है कि किसी भी ट्रस्ट या संस्था को सीधे तौर पर छापा मारने या कार्यवाही का अधिकार नहीं है। समाज में अगर किसी भी तरह भी तरह की अपराधिक या अनैतिक गतिविधि की जानकारी किसी संस्था या ट्रस्ट को प्राप्त होती है तो वह संबंधित पुलिस प्रशासन एवं सरकारी एजेंसियों से सूचना साझा कर सकता है। इसके अतिरिक्त ट्रस्ट या संस्था पुलिस प्रशासन एवं सरकारी एजेंसियों के साथ कार्यवाही के दौरान जा सकता है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सरकारी एजेंसियों से मिलते जुलते जैसे कि सीबीआई,सीआईडी,एनआईए आदि नामों से रजिस्टर्ड संस्थाओं के लाइसेंस पर सरकार विचार करने जा रही है भविष्य में ऐसी संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन समाप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अब इस तरह की संस्थाओं का रजिस्ट्रेशन भी करवाना आसान नहीं होगा।
किसी भी ट्रस्ट को नहीं हटा सकता प्रशासन
पब्लिक ट्रस्ट को प्रशासन नहीं हटा सकता है। गड़बड़ी होने की सूरत में और प्रमाण मिलने पर न्यायालय ही कोई निर्णय ले सकता है। मतलब ट्रस्ट के मामले में प्रशासन कोई निर्णय नहीं ले सकता है। केवल आर्थिक अनियमितता होने की सूरत में प्रकरण को न्यायालय तक ले जा सकता है। वह भी पर्याप्त प्रमाण होने की सूरत में ऐसा किया जा सकता है। ट्रस्ट के मामलों में में एसडीएम रजिस्ट्रार होता है। एसडीएम स्तर पर गड़बड़ी साबित होने पर न्यायालय के समक्ष प्रकरण रखकर निर्देश मांग सकता है। इससे पहले एसडीएम को भी लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होती।
ट्रस्ट के नियमों के मुताबिक ट्रस्ट भंग करने, नई नियुक्तियां करने या अन्य कोई दिशा निर्देश देने का अधिकार न्यायालय को है। प्रशासन एसडीएम के माध्यम से केवल निगरानी रख सकता है। ट्रस्ट चलाने के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होने, आर्थिक अनियमितता होने की सूरत में ही प्रशासनिक दखल दिया जा सकता है।
एसडीएम ट्रस्ट को कारण बताओ नोटिस देकर जवाब मांग सकता है। जवाब के बाद वह गलती सुधारने के लिए कह सकता है। इसके बाद भी गलती नहीं सुधरे तो न्यायालय में जाकर दिशा निर्देश मांग सकता है।रजिस्ट्रार के नाते एसडीएम निगरानी कर सकते हैं। उन्हें सभी ट्रस्ट हर साल आय-व्यय का लेखा जोखा भेजते हैं। इसमें गड़बड़ी होने और नहीं सुधारे जाने पर एसडीएम प्रकरण न्यायालय ले जा सकते हैं। निर्णय लेने का अधिकार न्यायालय को है।




