बिहार में रेड लाइट एरिया की बेटियां बनाती हैं दुल्हनों के लिए शगुन का ‘खोइछा’

मुजफ्फरपुर,(बिहार)। इस अंजुमन में आपको आना है बार बार। दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए। 1981 में रुपहले पर्दे पर आई निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म ‘उमराव जान’ का ये गाना आज भी कद्रदानों के कानों में रस घोलता है। अभिनेत्री रेखा पर फिल्माए गए इस गाने में एक अलग तरह की कशिश है। दर्द भी है और जमाने भर के ताने का निचोड़ भी है। सच है कि बदनाम गलियों से कोई भी शख्स गुजरने से हिचकता है। रात के अंधेरे में भले इन गलियों से गुनगुनाते हुए गुजरें। दिन के उजाले में उसे डर लगता है। मुजफ्फरपुर की एक ऐसी ही गली है चतुर्भुज स्थान वाली गली। ये रेड लाइट एरिया है। यहां तबलों की थाप घुंघरुओं की आवाज आज भी कभी-कभार गूंजती है। कभी ये इलाका जमींदारों की अय्याशी से गुलजार रहता था। यहां बिहार भर से बड़े-बड़े जमींदार पालकी लेकर आते थे। संगीत और मुजरे के कद्रदान थे। पैसे जमकर लुटाते थे। बदलते वक्त ने चतुर्भुज स्थान के घुंघरुओं की आवाज को धीमा कर दिया। मजबूरी और मुफलिसी ने तवायफों को जिस्म बेचने पर मजबूर कर दिया। उसके बाद इस इलाके में एक ऐसी ‘जुगनू’ चमकी जिसकी रोशनी से ये इलाका इन दिनों चर्चा में बना रहता है।
नसीमा खातून का संघर्ष
खुद को गर्व से रेड लाइट एरिया की बेटी कहने वाली नसीमा खातून ने इस इलाके की तस्वीर बदल दी। वो हस्तलिखित पत्रिका ‘जुगनू’ चलाती हैं। रेड लाइट एरिया की बच्चियों को जागरूक करती हैं। कईयों को पढ़ाया और उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। कई बेटियां इस इलाके से निकलकर काफी अच्छा कर रही हैं। नसीमा खातून को 2010 में सीएनएन और आईबीएन ने मिलकर रियल हीरो का अवार्ड दिया। नसीमा खातून एक मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पूरे इलाके को जागरूक करने में जुटी हैं। फिलहाल वे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में मानव रक्षक एवं एनजीओ की कोर सलाहकार समिति की सदस्य भी हैं। आप कहेंगे कि अचानक हम रेड लाइट एरिया की चर्चा क्यों करने लगे। वो इसलिए कि यहां की बेटियों ने अब दुल्हन की विदाई के वक्त घर से मां के हाथों मिलने वाले शगुन यानी खोइछा का निर्माण शुरू कर दिया है।
रेड लाइट एरिया की बेटियों का हुनर
हालांकि मुजफ्फरपुर रेड लाइट एरिया की बेटियां भले किसी घर की दुल्हन नहीं बनीं। डोली से नहीं उतरीं। अब इनके हाथों से बने खोइछा( जो कपड़े की छोटी सी डिजाइनर थैली होती है) कितने घरों की दुल्हनों के शगुन बन रहे हैं। जिन महिलाओं को परम्परा के नाम पर सामाजिक व्यवस्था में अलग-थलग किया गया है। वही महिलाएं बिहार की लोक परम्परा का हिस्सा खोइछे को डिजाइनर रूप देकर उसमें आधुनिकता के रंग भर रही हैं। शमीना, जैनब, मरियम, काजल, शगुफ्ता समेत 20 महिलाएं और लड़कियां सेल्फ हेल्फ ग्रुप जुगनू के नाम से कपड़ो के कतरन से खोइछा बना रही हैं। उनका कहना है कि अब पहनावा बदल गया है। हमारी लोक परम्पराएं नहीं बदलीं। आज भी घर से निकलते समय मां अपनी बेटियों का खोइछा भर कर देती हैं। बाजार में ऑनलाइन पोटली तो बिकती है पर काफी महंगी होती है।
खोइंछा हो रहा पॉपुलर
नसीमा खातून कहती हैं कि हमने सोचा क्यों नहीं हम पारम्परिक खोइंछा बनाकर उसे डिजाइनर रूप दें। शुरुआत में बड़े कपड़े की सिलाई के बाद बचे कपड़ों के कतरन से हमने बनाना शुरू किया। लोगों ने पसंद किया और मांग बढ़ी तो अब अलग कपड़ा लाकर बनाते हैं। अब यहां बने खोइछे की मांग आस-पास के जिलों में होने लगी है। मुजफ्फरपुर के रेड लाइट एरिया की महिलाओं का बनाया यह डिजाइनर खोइछा बेटी-बहुओं का मान बढ़ा रहा है। अब तो इस डिजाइनर खोइछा की मांग राज्य के बाहर भी होने लगी है। इस इलाके की 20 से अधिक महिलाएं जुगनू से जुड़े हैं। जो अन्य कपड़ों के साथ डिजायनर खोइछा भी बना रही हैं।
दुल्हनों का आंचल भरा रहे
रेड लाइट एरिया की बेटियों की मानें तो सिर्फ शादी ही नहीं बल्कि बेटी-बहू के मायके, ससुराल से जाने-आने के समय इस खोइछा में धान, दूब, पान, सुपारी, चावल, हल्दी के गांठ के साथ बड़ों का आशीर्वाद भी भरकर मिल रहा है। लोग उनके बनाए खोइछा को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। वंचित बेटियों के लिए काम रही संस्था जुगनू की संस्थापक नसीमा खातून का कहना है कि इस समाज की महिलाओं के लिए समाज का नजरिया अलग होता है। बेटियों को रोजगार मुहैया कराने के लिए जब उन्हें बुटीक के काम से जोड़ा गया तो महिलाओं ने खुद इसे बनाने की पहल की। महिलाएं कहती हैं कि हमारा आंचल खाली रह गया तो क्या हुआ, समाज की हर बेटी का आंचल सुख समृद्धि से भरा रहे, इसी कामना के साथ वह इसे बनाती हैं।

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