1984 के दंगा प्रभावित व्यक्ति को लौटाई जाए दुकान, दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला

Delhi High Court's decision to return shop to 1984 riot affected person

नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान जखीरा में अपनी दुकान से हाथ धोने वाले एक व्यक्ति को ‘पुनर्वास नीति’ के तहत आवंटित प्लॉट का आवंटन रद्द करने के डीडीए के फैसले को गलत ठहराया। कोर्ट ने कहा कि महज इसलिए कि वह इलाहाबाद बैंक का मूल लिफाफा या उसके लिए चुनाव आई-कार्ड पेश नहीं कर सका, इसका मतलब यह नहीं कि इसमें चूक पर आवंटन रद्द कर दिया जाए।
जस्टिस मनोज जैन ने कहा कि याचिकाकर्ता को मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिए में दुकान चाहे दंगों के कारण आवंटित की गई हो या जखीरा फ्लाईओवर के निर्माण के चलते, यह सर्वमान्य तथ्य है कि दंगों के बाद कराया गया सर्वे किसी और का नहीं, बल्कि खुद डीडीए का था। ऐसा सर्वे सीधे तौर पर प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए था और यहां तक कि डीडीए के जवाबी हलफनामे के अनुसार, याचिकाकर्ता का नाम लिस्ट में था और इसलिए उसे मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिए में उपरोक्त प्लॉट आवंटित किया गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि अदालत इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकती कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में याचिकाकर्ता की दुकान को जला दिया गया था और उसने मामले की सूचना तुरंत पुलिस को दी, जिसके आधार पर एफआईआर भी दर्ज हुई थी। कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने इनके अलावा जो भी दस्तावेज अथॉरिटी के सामने रखे, उनमें से कोई जाली या गलत नहीं पाया गया। कोर्ट ने इस बात को भी जहन में रखा कि एक छोटे-मोटे दुकानदार को सिविक एजेंसी से लाइसेंस और सेल्स टैक्स विभाग से रजिस्ट्रेशन हमेशा नहीं मिल पाता है।
हाई कोर्ट ने लक्ष्मण दास की याचिका मंजूर कर ली और उन्हें 10 दिन के भीतर मंगोलपुरी फेस-2 इंडस्ट्रियल एरिए में उनके प्लॉट/ दुकान का कब्जा लौटाने का डीडीए को निर्देश दिया। याचिकाकर्ता ने डीडीए के उस आदेश को यहां चुनौती दी थी, जो 1885 में उन्हें इसी इलाके में आवंटित प्लॉट का आवंटन रद्द करने के लिए जारी किया गया।

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