मरने के बाद भी दूसरे को रोशनी दे गया 17 साल का सार्थक, स्कूल के पहले दिन ही आया था हार्ट अटैक

छतरपुर,(मध्य प्रदेश)। छतरपुर में तीन दिन पहले यानी 10 जुलाई को शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ने वाले 17 साल के सार्थक टिकरया की अचानक मौत हो गई थी। सार्थक को स्कूल में पार्थना के दौरान हार्ट अटैक आया और कुछ मिनट के बाद ही उसकी जान चली गई। सार्थक के पिता आलोक टिकरया शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी और समाजसेवी हैं। अपने छोटे बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए पिता ने उसकी आंखें दान कर दी हैं। केवल आंख ही नहीं, परिवार ने उसका हर अंग दान करने का फैसला किया है।
मुझे कुछ हो जाए तो मेरी आंखें दान कर देना
आलोक टिकरया का कहना है कि उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा है कि उनका बेटा अब उनके साथ नहीं है। परिवार का कोई भी सदस्य विश्वास नहीं कर पा रहा है। सार्थक समाज सेवा करना चाहता था। वह कई बार जरूरतमंद को ब्लड देने के अस्पताल गया, लेकिन 18 साल से कम उम्र होने की वजह से वह रक्तदान नहीं कर पाया। वह अक्सर कहता था कि अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी आंखें दान कर दी जाएं।
पढ़ाई में था बेहद होशियार
सार्थक के चाचा अरुण टिकरया ने बताया कि उनका भतीजा पढ़ाई में बहुत होशियार था। उसे हमेशा 80 प्रतिशत से अधिक मार्क्स मिलते थे। 12वीं में उसने डिसेंट इंग्लिश स्कूल में एडमिशन लिया था। नए स्कूल में उसका पहला ही दिन था और यह घटना हो गई।
धार्मिक प्रवृत्ति का था सार्थक
सार्थक बेहद धार्मिक प्रवृत्ति का था। वह रोज सुबह उठकर पूजा पाठ करता था। त्योहारों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करता था। हादसे के दिन भी स्कूल जाने से पहले वह पिता के पैर छूकर गया था और कहा था कि जल्दी लौट आऊंगा।
कुछ मिनट में चली गई थी जान
स्कूल में अचानक हार्ट अटैक आने के बाद सार्थक के परिजन उसे जिला अस्पताल ले गए। लगभग आधे घंटे तक इलाज के लिए परिजन अस्पताल में जद्दोजहद करते रहे। जिला अस्पताल में सार्थक ने अंतिम सांस ली। इसके बाद पिता आलोक टिकरया ने इस बात का निर्णय लिया कि उसके बॉडी के सभी पार्ट्स दान कर दिए जाएं। जिला अस्पताल में इसकी व्यवस्था नहीं थी। चित्रकूट से डॉक्टरों की एक टीम बुलाई गई और सार्थक की आंखें दान की गईं।

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