रामनवमी पर हिंसा की खबरों के बीच भाईचारे की मिसाल हैं आसिफ, 30 साल से जिंदा रखी है परंपरा

मोमिनपुरा,(महाराष्ट्र)। कोई प्रयास छोटा नहीं होता… यह बात सच साबित की है अब्दुल हमीद और उनके परिवार के लोगों ने। अब्दुल हमीद भले ही इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके दिखाए रास्ते पर आज भी उनका परिवार चल रहा है। बात 1993 की है जब बम धमाकों से मुंबई पूरी तरह हिल गई थी। मार्च 1993 बाबरी मस्जिद  के विध्वंस के बाद हुए मुंबई धमाकों से देश हिल गया था, उस वक्त दिवंगत अब्दुल हमीद करनाल ने सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए एक छोटा कदम उठाया। पिछले 30 वर्षों से, रामनवमी शोभायात्रा  के दौरान यह एक अटूट परंपरा रही है कि करनाल परिवार के नेतृत्व में मुसलमानों का एक समूह मोमिनपुरा के प्रवेश द्वार के पास जुलूस का स्वागत करता है। पोद्दारेश्वर मंदिर से जुलूस के निकलने पर करनाल के बेटे आसिफ भी कुछ दूरी तक साथ चलते हैं।

तीन साल के अंतराल के बाद इस बार शोभायात्रा निकाली गई। इस बार आसिफ और उनके चार भाइयों ने अधिक उत्साह के साथ तैयारी की। आसिफ का कहना है कि वह मंदिर परिसर में होने वाली सभाओं में भी हिस्सा लेते हैं और समारोह के लिए चंदा भी देते हैं। जुलूस के स्वागत के लिए मोमिनपुरा के पास एक मंच बनाया गया। मेरे पिता के मित्रों सहित लगभग 60 से 70 लोग आयोजन टीम का हिस्सा रहे। इलाके के अन्य लोग भी शामिल होते रहे है।

दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया था जिसके बाद इलाके में दंगे हुए। मुझे अभी भी याद है कि कैसे पुलिस द्वारा आंसू गैस के गोले दागे जाने के बाद हमारी दुकान धुएं से भर गई थी। उन्होंने गोलियां भी चलाईं, जिससे जनहानि हुई। उन दिनों दोनों समुदायों के बीच काफी मनमुटाव हुआ करता था। मेरे पिता,जो एक सामाजिक कार्यकर्ता थे उन्होंने सद्भाव बनाने के बारे में सोचा और शोभायात्रा का स्वागत करने की परंपरा शुरू की।

आसिफ का कहना है कि एक वक्त था जब परिवार के खिलाफ फतवा जारी किया जाता था। हालांकि, अब मोहल्ले के अन्य लोग भी इस इशारे के पीछे की भावना को समझते हैं। करनाल के इलाके में एक भोजनालय था जिसे एनएमसी के साथ विवाद के बाद ध्वस्त कर दिया गया था। अब वे एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। हम नीचे हो सकते हैं लेकिन आत्माएं अभी भी ऊंची हैं। एक समय था जब मैंने 5 हजार रुपये मंदिर में दान किए थे अब 500 से संतोष करना पड़ रहा है।

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