मोरम खदान ठेकेदार की मनमानी: किसानों की फसल रौंदकर बनाया रास्ता, मुआवजा देने से किया इंकार

नाराज किसानों ने खदान मार्ग रोक लगाया जाम, अधिकारियों पर मिलीभगत के आरोप

फतेहपुर/उत्तर प्रदेश। भारत का ग्रामीण अंचल आज भी खेती-किसानी पर टिका है। किसान अपनी मेहनत से न केवल परिवार का पेट पालते हैं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की नींव भी मजबूत करते हैं। ऐसे में जब किसी ठेकेदार की मनमानी से किसानों की फसलें रौंदी जाती हैं, तो यह केवल खेत का नुकसान नहीं, बल्कि समाज की आत्मा पर चोट है। मोरम खदान तक पहुँचने के लिए ठेकेदार ने खेतों के बीच से रास्ता बना दिया। जेसीबी और ट्रकों ने खड़ी फसल को रौंद डाला। किसानों की मेहनत, लागत और उम्मीदें पलभर में मिट्टी में मिल गईं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ठेकेदार मुआवजा देने से साफ इंकार कर रहा है। यह रवैया न केवल गैरकानूनी है, बल्कि अमानवीय भी है।
फतेहपुर जिले की खागा तहसील के किशनपुर थाना क्षेत्र स्थित संगोलीपुर मडैयन मोरम खदान एक बार फिर विवादों में है। खदान संचालक पर किसानों की जमीन और खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाकर जबरन रास्ता बनवाने के गंभीर आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बिना किसी मुआवजे, अनुमति और सूचना के खदान संचालक के लोगों ने रात के अंधेरे में खेतों से रास्ता तैयार कर दिया और सुबह होते ही भारी वाहन उसी रास्ते से दौड़ने लगे। इससे किसानों की गेहूँ और सरसों की खड़ी फसल बुरी तरह नष्ट हो गई। इस मनमानी से नाराज किसानों ने सोमवार को मोरम खदान के मुख्य रास्ते को रोककर जाम लगा दिया। ग्रामीणों ने खदान संचालक पर दबंगई करने और मुआवजा मांगने पर जान से मारने की धमकी देने तक के आरोप लगाए। किसानों ने कहा कि खदान संचालक लगातार धमका रहा है कि “ज्यादा बोलोगे तो देख लूंगा”, जिससे क्षेत्र में भारी आक्रोश है।
किसानों का आरोप यह भी है कि खदान शुरू होने से लेकर अब तक विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे। शुरुआत से ही खदान संचालन नियमों के विपरीत चल रहा है और स्थानीय प्रशासन शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं कर रहा। ग्रामीणों ने कुछ अधिकारियों पर भी मिलीभगत कर खदान संचालक का संरक्षण करने के गंभीर आरोप लगाए। जाम लगने की सूचना पर स्थानीय पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और किसानों को शांत कराने का प्रयास किया। किसानों का कहना है कि जब तक उनकी फसल का उचित मुआवजा नहीं मिलेगा और अवैध रास्ता बंद नहीं किया जाएगा, विरोध जारी रहेगा। ग्रामीणों ने मांग की कि खदान संचालक पर तुरंत कार्रवाई की जाए, मुआवजा दिया जाए और किसानों को मिल रही धमकियों की निष्पक्ष जांच कर अभियोग पंजीकृत किया जाए।
किसानों ने शिकायत प्रशासन तक पहुँचाई है, लेकिन कार्रवाई की गति धीमी है। यह सवाल उठता है कि जब प्रशासनिक मशीनरी जनता की रक्षा के लिए है, तो फिर ठेकेदारों की मनमानी क्यों बर्दाश्त की जाती है? क्या विकास के नाम पर किसानों की आजीविका कुर्बान करना ही नियति बन गई है? यह घटना केवल एक गाँव या जिले की समस्या नहीं है। यह पूरे देश के किसानों की पीड़ा का प्रतीक है। जब तक समाज इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक ठेकेदारों और भ्रष्ट तंत्र की मनमानी जारी रहेगी।

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