पप्पू यादव के संसद परिसर में नाटक का शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने किया समर्थन, बोले- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार
राम मंदिर चंदा चोरी विवाद को लेकर संसद परिसर में पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने नाटक किया। उसके बाद संत समाज नाराज हो गया। इस घटना के बाद पप्पू यादव के समर्थन में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान आया हैं। उन्होंने कहा है कि पप्पू यादव ने कुछ भी गलत नहीं किया।

पटना/एजेंसी। अयोध्या राम मंदिर चंदा मामले को लेकर संसद परिसर में पूर्णिया सांसद पप्पू यादव द्वारा साधु का वेश धारण कर किए गए नाटकीय प्रदर्शन पर उठे विवाद के बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उनका खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि नाटक के माध्यम से किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में आता है। यदि प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था भंग नहीं हुई और किसी की मानहानि नहीं की गई, तो इसे लेकर आपत्ति का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि पप्पू यादव ने संसद परिसर में चंदा चोरी के मुद्दे को लेकर एक नाटक प्रस्तुत किया था। इस नाटक में उन्होंने साधु का वेश धारण किया और चंदे के नाम पर कथित अनियमितता को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शन को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में साधु-संतों द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराने की बात सामने आ रही है और अयोध्या में भी विरोध प्रदर्शन किया गया, लेकिन पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि पप्पू यादव ने आखिर गलत क्या किया।
उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। नाटक, कला, संगीत और रचनात्मक माध्यमों से किसी विषय पर अपनी बात रखना अभिव्यक्ति का ही हिस्सा है। उनके अनुसार शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराने का अधिकार भी संविधान देता है, बशर्ते इससे सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित न हो।
शंकराचार्य ने कहा कि किसी भी प्रदर्शन में यह ध्यान रखना जरूरी है कि कानून-व्यवस्था न बिगड़े और किसी व्यक्ति की मानहानि न हो। यदि किसी स्थान पर प्रदर्शन के लिए अनुमति आवश्यक हो तो नियमानुसार अनुमति या सूचना दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पप्पू यादव सांसद हैं और संसद परिसर में सुरक्षा व्यवस्था पहले से मौजूद रहती है। यदि वहां किसी प्रकार की अशांति या सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान नहीं हुआ तो केवल नाटक करने को लेकर आपत्ति समझ से परे है।
उन्होंने कहा कि न तो सड़क जाम की गई, न किसी रेल या विमान सेवा को रोका गया। ऐसे में प्रदर्शन के स्वरूप और उसके उद्देश्य को भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधु का वेश धारण करने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि नाटक में किसी चरित्र या परिस्थिति को प्रदर्शित करने के लिए अलग-अलग वेश धारण करना सामान्य कलात्मक प्रक्रिया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि यदि किसी नाटक का उद्देश्य जनजागरण करना है और उसमें किसी विशेष वेश की आवश्यकता है तो कलाकार उस वेश को धारण कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि चंदा चोरी के आरोपों को लेकर कोई प्रतीकात्मक नाटक किया गया, तो उसमें साधु का वेश धारण करने को ही आपत्तिजनक क्यों माना जा रहा है।
उन्होंने कहा कि जिस चोरी को लेकर विवाद चल रहा है, उसमें चोरी करने वालों ने कथित रूप से किस प्रकार का वेश धारण किया था, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है। ऐसे में केवल साधु का वेश धारण किए जाने को आधार बनाकर नाटक को गलत ठहराना उचित नहीं है।
शंकराचार्य ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 205 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी वेश का इस्तेमाल ठगी या छल करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि लोकजागरण या नाटकीय प्रस्तुति के लिए किया जा रहा है, तो उसके उद्देश्य को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नाटक और फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाओं के अनुरूप वेश धारण किया जाता है और इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सामाजिक और सार्वजनिक मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए रचनात्मक माध्यमों का इस्तेमाल लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। उनके अनुसार किसी प्रदर्शन पर कार्रवाई या आपत्ति से पहले यह देखना जरूरी है कि उससे वास्तव में कानून-व्यवस्था प्रभावित हुई या किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
पप्पू यादव के इस प्रदर्शन को लेकर जहां संत समाज के एक वर्ग की ओर से विरोध और प्राथमिकी की मांग की गई है, वहीं शंकराचार्य के बयान के बाद यह मामला राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन गया है। उनके समर्थन से चंदा मामले को लेकर चल रही बहस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार जैसे मुद्दे भी प्रमुखता से सामने आए हैं।




